अपनी विचारधारा सहयोग पर आधारित


दीनदयाल उपाध्याय

गतांक का अंतिम भाग…

धर्म जिससे धारण होता है, वह धारणा संघर्ष से नहीं उत्पन्न होती। धारणा होती है इस सामंजस्य से। समन्वय होता है एक-दूसरे के जीवन से एकरूप होने से, एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझने का प्रयत्न करना है। महाभारत में धर्म और अधर्म की बहुत सरल व्याख्या की गई है। ‘भ्रम’ अधर्म है यानी मेरा यह अधर्म है। तीन अक्षर ‘न मम’ मेरा नहीं यह धर्म है। मेरा कुछ नहीं, जो कुछ है तेरा, यही भाव धर्म है। मैं, मेरा है, यह अधर्म है। इससे अहंकार जाग्रत् होता है, स्वार्थ उत्पन्न होता है। व्यक्ति अपने को ही केंद्र बनाकर संपूर्ण सृष्टि का विचार करता है। अधर्म का भाव पैदा होता है।

यदि संसार को चलाना है तो मैं नहीं, मेरा कुछ नहीं। दूसरे का विचार करके चलो। यही विचार इसी को अपने यहां नाम दिया है, उसको यज्ञ कहते हैं। यज्ञ से मतलब हवनकुंड नहीं। उसमें आहुति डालना, यह यज्ञ का प्रतीक है। यह यज्ञभाव जगाने की एक पद्धति है। यह संस्कार डालने का एक तरीक़ा है। इसलिए जब आहुति डालते हैं, तब कहते हैं ‘इदं इन्द्राय इदं न मम्’, यह मेरा नहीं है, यह यज्ञ की कल्पना है।

इसके आगे भी कहा जो यज्ञ से योग करता है, वह तो अमृत है। प्रसाद के रूप में जो मिलेगा, उसे ग्रहण करूंगा, यह त्याग का भाव अमृत होता है। माता भोजन बनाती है तो सबके पश्चात् जो बचता है, उसे ग्रहण करती है। उसे उसी में आनंद का अनुभव होता है। परंतु होटल में देखें रसोइया पहले अपने लिए निकालकर अलग रख लेता है, तब बाद में सबको खिलाता है। मां के भोजन में क्यों स्वाद का अनुभव और रसोइए के भोजन में क्यों नहीं। मां को कुछ बचे-न-बचे, पर अपने पुत्रों को मिलना चाहिए। यह भाव रहता है। यह दृष्टिकोण अपने यहां का है। मैं अपने लिए नहीं तो दूसरे की सुविधा के लिए हूं। मैं अपने लिए नहीं, तो दूसरे के लिए जिंदा हूं।

व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज का हित दोनों का मेल बैठता है। व्यक्ति स्वतंत्र है। उस पर कोई रोक नहीं, परंतु अपनी स्वतंत्रता का उपयोग यदि अपने ही लिए करेगा तो, अपने ही लिए जिंदा रहेगा तो फिर वह ग़लत कार्य करेगा। जब व्यक्ति अपने लिए जिंदा नहीं रहता तो दूसरों के लिए चिंता करता है। समाज की सेवा करने का प्रयत्न करेगा। हमारा राष्ट्र है, वह जिंदा रहे। यह भाव मन में आता है, हमारा ही राष्ट्र जिंदा रहे बाक़ी की दुनिया ख़त्म हो जाए, ऐसा विचार लेकर नहीं चले हैं।

हम यह कल्पना लेकर चले हैं कि हमारा हिंदुस्थान ऊंचा उठे और दुनिया भी रहे। कल्पना कीजिए यदि दुनिया के अंदर कोई न रहे तो क्या हमारा परम वैभव होगा? क्या संसार में केवल हिंदुस्थान रह जाए। ख़ुद को खाने को हो पीने को हो, परंतु यदि हमारा परम वैभव देखनेवाला कोई न रहा तो परम वैभव कैसा?

यह कहानी स्मरण आती है कि एक सज्जन थे। उन्हें एक थाली मिली, जिससे वे जो चाहें, वह प्राप्त कर सकते थे। अतः उसने अपने लिए मकान मांगा तो पड़ोसी को दो-दो मिल गए। उसने अपने लिए धन मांगा तो पड़ोसी को दूना मिल गया। उसे द्वेष उत्पन्न हुआ। उसने फिर उलटा सोचना आरंभ किया। उसने मांगा, मेरी एक आंख फूट जाए। पड़ोसी की दोनों फूट गई। उसने अपने दरवाजे के सामने एक कुआं मांगा, पड़ोसी के दरवाजे के सामने दो कुएं हो गए। उसने अपनी एक टांग टूटने का मांगा, पड़ोसी की दोनों टूट गईं। धीरे-धीरे सभी अपंग होकर कुएं में गिर गए। इसको लगा कि अब मैं सबसे बड़ा हूं। परंतु उसके बड़प्पन को देखनेवाला कोई नहीं, वह यह भूल गया कि भले ही पड़ोसी उससे दूने धनवान बनते हैं, परंतु वह उसके कारण है। उसने भगवान् से कहा, महाराज, आपने कैसा वरदान दिया कि मेरा वैभव देखनेवाला कोई नहीं। तो भगवान् ने बताया कि तेरे कारण से उसके दो घर बने तो वैभव तो तेरा ही था।

इस प्रकार की प्रवृत्ति कि दुनिया में हम ही रहें। बाक़ी के लोगों को हडप कर जाओ। प्रकृति पर विजय प्राप्त करो। इस प्रकार का एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को exploit कर रहा है। प्रकृति को exploit कर रहा है। यह exploitation हमारे यहां नहीं होता। हम प्रकृति का शोषण नहीं करते। गऊ माता है, दूध माता के प्रसाद के रूप में लेता हूं। हम गंगा के पानी को exploit नहीं करते, क्योंकि उसे मां मानते हैं और उसके द्वारा प्रसाद रूप में जल लेते हैं। हमारे यहां घरों में माताएं, बहनें घर का काम करती हैं तो पश्चिम के लोग यही परिभाषा करते हैं कि पुरुष स्त्रियों का शोषण कर रहा है। पुत्र बीमार होता है, मां दिन-रात सेवा करती है तो क्या मां का पुत्र exploitation कर रहा है। यह exploitation नहीं। यह परिभाषा ग़लत है। संपूर्ण प्रकृति के साथ हमारा यह भाव नहीं है। इसलिए हमारा तो वैभव है, जिस वैभव में हम बहुत ऊंचे उठेंगे, धनधान्य से देश पूर्ण रहेगा। हम ज्ञानवान रहेंगे और बाक़ी की दुनिया अज्ञानी रहेगी, यह भाव नहीं। अपितु जिस प्रकार हम बढ़ेंगे, उसी तरह दुनिया के लोगों को भी बढ़ाएंगे।

हमारे यहां प्राचीन काल में जो आदर्श रखे हैं, वह है ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ दुनिया को आर्य बनाओ। हमने यह नहीं कहा कि हमें ज्ञान प्राप्त हो गया तो उसे दुनिया से Secret रखें। आज तक हमने दुनिया से कोई Secret नहीं रखा। कोई चीज़ छिपाकर नहीं रखी। परंतु पात्र-अपात्र का अवश्य ध्यान रखते हैं। बीच के काल में कुछ छिपा था तो उसे पात्र-अपात्र का विचार किया। इसलिए हमारे यहां के लोग बाहर ज्ञान का संदेश लेकर गए, उन्हें आर्य बनाया। उसका मतलब यह नहीं कि विश्व में जो है, उनको गुलाम बनाओ। विश्व को भारत का गुलाम बनाओ अपितु उसके पीछे यह भाव है कि विश्व ऊंचा उठे। उसके आधार पर हम खड़े हुए हैं। एक प्रकार से हम देखें कि हम विश्व की एकता चाहते हैं। मानव की एकता चाहते हैं। हमारा धर्म मानव का हित चाहता है। मानव का हम सच्चे अर्थ में उत्कर्ष चाहते हैं। संसार के अंदर ढाई अरब की संख्या का मानव खाने-पीने वाला जानवर नहीं, तो सब लोग मानव बनेंगे। मानवोचित स्थान प्राप्त करके रहेंगे। यही हमारे जीवन का आधार है। इस सत्य का हमने आकलन किया है।

बड़ी इकाई छोटी इकाई का पूरक बनकर खड़ी हो, छोटी इकाई बड़ी इकाई का पूरक बनकर खड़ी हो। जैसे यदि कोई पुष्प गुंथकर माला के रूप में आ जाता है, यद्यपि उसका अलग अस्तित्व नहीं रहता, परंतु वह माला का एक अंग बन जाता है तो देवता के चरणों पर चढ़ता है। जीवन सार्थक हो जाता है। अन्यथा अलग पेड़ से गिरकर सारा पुष्प कुम्हलाकर नष्ट हो जाता है। इससे पुष्प की हस्ती समाप्त नहीं होती, अपितु पुष्प का विकास होता है। उसके व्यक्तित्व का विकास होता है। इसी प्रकार समाज के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एकरूपता चाहिए। इससे उसका व्यक्तित्व नष्ट नहीं होता, अपितु विकसित होता है। व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त नहीं होती अपितु समाजरूपी विराट स्वरूप का अंग बनकर स्वयं विराट् बन जाता है। यदि यह भाव रहा कि मेरा इससे कोई संबंध नहीं, मेरा इसका कोई नाता नहीं, तो दोनों के बीच संघर्ष आ गया है।

वास्तव में इन दोनों के बीच कोई संघर्ष नहीं, व्यक्ति और समाज के बीच कोई संघर्ष नहीं, अगर संघर्ष की कल्पना आई तो उस संघर्ष में से बराबर दुःख ही दुःख पैदा होता जाता है। हमारे यहां ऐसी कोई कल्पना नहीं। हम अपने आपको एक करना चाहते हैं।

इसलिए जब हम संगठन की बात करते हैं तो हमारा यह संगठन इसी आधार पर खड़ा है, नहीं तो कौन संगठन करता है, क्यों मिलकर रहें? बहुत लोगों को लगता है, स्वार्थ के लिए संगठन फिर उसमें भी कौन सा स्वार्थ। फिर हम संघ का कार्य करते हैं। हमारा कौन सा स्वार्थ सिद्ध होता है। सामूहिक रूप में संगठन का विचार करें। स्वार्थ का आधार लेकर चलेंगे तो उसमें कोई प्रेरणा नहीं रहेगी। संगठन तो इसलिए होता है कि हमारे राष्ट्र का जीवन है। एक हमारी परंपरा चली आ रही है। इस आधार के ऊपर ही हम विश्व को भी देखते हैं।

सौभाग्य का विषय है कि आज दुनिया के दूसरे देश भी कम-से-कम यह मंजूर करने लगे हैं कि मानव की एकता होनी चाहिए। उनको लग रहा है कि मानव लड़ रहा है, यह ठीक नहीं। मानव में लड़ाई बंद होनी चाहिए। इसका विचार कर रहे हैं। उनको शायद पता नहीं, ज्ञान नहीं-उसका मौलिक आधार कौन होगा? उसके पीछे का तत्त्वज्ञान कौन सा होगा? वह तत्त्वज्ञान हमें प्राप्त है। हजारों वर्षों से हम इसको लेकर चले हैं और चलेंगे तो हमारा चालीस करोड़ के राष्ट्र का एक जीवन ऐसा नहीं रहेगा कि इधरउधर की मार खा रहे हैं। सबसे छोटे, पददलित, पिछड़ा हुआ राष्ट्र-जीवन दिख रहा है। बहुत से लोग अपने व्यक्तिगत जीवन को ही सब कुछ समझकर, उससे थोड़ा समाधान होगा, ऐसा विचारकर चलते हैं। राष्ट्र-जीवन का विचार करने के बाद में ऐसा लगता है कि हिंदुस्थान ऐसा राष्ट्र है, जो आर्थिक और सब दृष्टि से पिछड़ा हुआ है।

हिंदुस्थान का सामान्य नागरिक अपने सामान्य, अपनी राष्ट्रीय भावना से दूर भागता है, क्योंकि राष्ट्र का विचार करते ही पाकिस्तान की धमकियां ध्यान में आती हैं। अपनी lowest income है, यानी राष्ट्रीय आमदनी इतनी पीछे है कि राष्ट्र का विचार करते ही उनके सामने यह आता है कि इतना करोड़ों का विदेशों से क़र्जा ले रखा है, इसका क्या होगा? दुनिया के बाक़ी लोग अंतरिक्ष में चले जा रहे हैं और लोग कहते हैं कि हम तो बैलगाड़ी के युग में जा रहे हैं। एक सज्जन थे लखनऊ में, उनका जन्म सन् 1948 के बाद जब गांधीजी की हत्या नाथूराम गोडसे के द्वारा हुई, तब हुआ था। अब दुर्भाग्य से कहिए या संयोग से कहिए कि उनका नाम भी नाथूराम था। उनका नाम लेते ही नाथूराम गोडसे का स्मरण हो जाता था, उन्होंने अपना नाम नाथूराम बदल दिया। उन्होंने उसे बदलकर नाथूलाल कर दिया। पहले तो उन्होंने नाथूलाल कर दिया। लोगों को फिर भी अच्छा नहीं लगा। फिर तो नाथूलाल को भी बदलकर रामनिवास कर लिया। नाम बिल्कुल ही बदल डाला। यह सोचने का ग़लत तरीक़ा है। उससे काम नहीं होगा। हमारे सामने केवल इतना ही प्रश्न नहीं है कि चीन ने अब हमारे ऊपर आक्रमण किया तो उस आक्रमण को समाप्त कर दें। हमारी राष्ट्रीय आय कम है, राष्ट्र की आमदनी बढ़ा लें; यह चीजें करणीय हैं। परंतु हमारी गति वहीं तक नहीं है। इसके आगे भी कुछ करना होगा, जैसे कि अंग्रेज़ों को हटाया। हमारी स्वतंत्रता का अर्थ इतना ही हमारे सामने नहीं है। अंग्रेज़ों को आख़िर क्यों हटाया, इसलिए कि दुनिया में हमारा राष्ट्र कुछ करने के लिए पैदा हुआ है। हम दुनिया को कुछ देने के लिए पैदा हुए हैं। हम मंदिर में पूजा करने जाते थे, अंग्रेजों ने हमें पूजा करने से रोका। उसकी पूजा में वो बाधक होता था, उसने हमको हथकड़ी पहनाकर जेल में डाल रखा था।

जिस ध्येय देवता की पूजा करने के लिए हम चल रहे थे, उसके बीच में बाधक बनकर वह खड़ा हो गया था। हम जेल से छूटकर आए हैं। आज जो छूटा है तो पहला काम क्या करना चाहिए? पहला काम यही कि हम मंदिर की ओर जाएं। उसी के लिए हम जेल गए थे, परंतु यदि मंदिर की ओर न जाकर सीधे सिनेमा देखने चले जाएं, क्योंकि महीने भर से सिनेमा देखने नहीं गए थे, जेल में इतने दिन से बंद थे, तो यह ग़लत होगा। सबसे पहले हमें उस मंदिर की ओर जाना चाहिए, जो बाधाएं आती हैं, उनको दूर करना होगा। यदि हमारे मार्ग में चीन आएगा तो उसको दूर करेंगे और जो अन्य विकृतियां हमारे सामने बाधक बनकर आएं, तो हमारा धर्म है कि हम उन्हें दूर करें। दुनिया में हम कुछ करने के लिए पैदा हुए हैं, इस सत्य को हम पहचानें।

यह सत्य शक्ति के आधार पर टिक सकता है, उसका हम ध्यान करें। जैसे समुद्र भी यज्ञ करता है, समुद्र का पानी भाप बनकर उड़ता है, पानी से वर्षा होती है। संपूर्ण सृष्टि को चैतन्य मिलता है। वह सब सृष्टि को ही अपना देता चला जाता है। यह यज्ञ के भाव हैं, जिसके आधार पर सृष्टि चल रही है। वह हमारे जीवन का भाव बने तो हम देखेंगे कि फिर मानव के जीवन में अशांति के स्थान पर शांति आएगी। यह काम हमें करना है। संसार को ज्ञान का संदेश देंगे। यह काम करने के लिए इसका सीधा तरीक़ा यह है कि हमें अपने जीवन को उसके अनुसार ढालना पड़ेगा और जीवन के ढालने का व्यावहारिक रास्ता हमने अपना लिया है। हमने जिस मार्ग का अवलंबन किया है, वह आप सबको पता है। वह है अपना संघ का दैनिक कार्य। संघ की पद्धति से हम समाज का संगठन करते हैं।

यहां पर लोगों के सामूहिक स्वार्थों की पूर्ति नहीं होती, यदि कोई सोचे कि यहां तमाम लोग एकत्र होते हैं। हम व्यापारी हैं तो लोगों से संबंध लाकर हमारा व्यापार बढ़ेगा। मैं डॉक्टर हूं। प्रत्येक के परिवार में लोग बीमार पड़ते हैं, अतः हमारी Practice बढ़ेगी। तो यहां उलटा होता है। यदि बाहर फ़ीस मिलती है तो यहां अपनत्व के कारण वह भी नहीं मिलती। यदि कोई अध्यापक सोचे, यहां काफ़ी विद्यार्थी हैं। अतः यहां आने पर ट्यूशन प्राप्त होगा। तो यहां उलटे मुफ्त में पढ़ाना पड़ता है। हमारे संगठन का आधार स्वार्थ नहीं। हमने जिस आधार पर अपना संगठन खड़ा किया है, उसमें अपने राष्ट्र जीवन की एकात्मता का दर्शन होता है। यही भाव हम विश्व के संबंध में भी रखते हैं। संपूर्ण विश्व योग्य दृष्टि देने का हिंदू राष्ट्र का यह अवतार कार्य है। इस अवतार कार्य को पूरा करना यही परम वैभव है। जब तक यह अवतार कार्य पूरा नहीं होता, तब तक हमारा परम वैभव होता नहीं। परम वैभव प्राप्त करने के लिए जो चीज़ हम मांग सकते हैं, वह धर्म के आधार पर होगी। और तीसरी वस्तु भी संगठित कार्यशक्ति, जिसके द्वारा परम वैभव प्राप्त होगा, उसका आधार भी धर्म ही होगा। इसलिए वह संगठित शक्ति, धर्म और परम वैभव तीनों वस्तुएं एक ही हैं। उदाहरण के लिए, एक बूढ़ा था, उसने तपस्या की। ईश्वर ने उससे एक वरदान मांगने को कहा। वह बूढ़ा अंधा था, ग़रीब भी और नि:संतान भी। तीनों वस्तुएं चाहता था, परंतु वरदान एक ही मिलना था। अतः उसने बुद्धिमत्ता से यह वरदान मांगा कि मैं अपने नाती को सोने की कटोरी में खीर खाते हुए देखू। अब इस एक ही वरदान से उसे आंख, धन और संतान भी प्राप्त हो गई।
इसी प्रकार हमने भी भगवान् से तीनों चीजें मांग लीं। किंतु ये तीनों चीजें एक ही हैं। संगठित कार्यशक्ति बिना धर्म के संभव नहीं और धर्म के बिना परम वैभव नहीं। अतः इस कार्य का विचार करें, उसके लिए संपूर्ण शक्ति आ गई तो हमारे प्रतिदिन के कार्य के द्वारा ही एक-एक क़दम आगे बढ़ाकर अपने जीवन में सुख और आनंद की प्राप्ति हो सकेगी।
(समाप्त)

-संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग : हरिगढ़ (5 जून, 1962)