सांस्कृतिक अधिष्ठान


भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष एवं एकात्म मानववाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा 4 जून, 1959 को कानपुर में संपन्न संघ शिक्षा वर्ग में दिए गए बौद्धिक का संपादित प्रथम भाग :

दीनदयाल उपाध्याय

एक साधारण सा विचार हम लोगों के सामने आता है कि हमारी संस्कृति संपूर्ण मानव की संस्कृति या मानव की एकता से, कहां तक मेल खा सकती है। क्या ऐसा नहीं है कि इस प्रकार से हम अपनी संस्कृति के ऊपर बल देकर दूसरे लोगों के लिए किसी एक प्रकार का संकट उत्पन्न कर दें या जिस प्रकार से अपनी-अपनी संस्कृति के ऊपर बाक़ी के लोगों ने जो बल दिया है, उस बल के परिणामस्वरूप संसार में जो भिन्न-भिन्न युद्ध हुए, उसी प्रकार हम भी किसी एक भावी युद्ध की नींव रख दें। इस प्रकार का भय बहुत से लोगों के मन में आता है और इस भय का बहुत बड़ा कारण शायद यह है कि पिछली लड़ाई में हिटलर ने जिस एक सिद्धांत के ऊपर खड़े होकर संपूर्ण जर्मन राष्ट्र को संगठित किया और जिसका परिणाम अंत में विश्वयुद्ध हुआ। उसमें किसी प्रकार से जर्मनी की जो एक विशिष्ट संस्कृति थी, जर्मनी की जो एक विशुद्ध राष्ट्र की भावना थी, जर्मनी की जो एक विशुद्ध महत्त्वाकांक्षा थी, उसका आधार लेकर वह खड़ा हुआ था।

अंग्रेज़ी में यह कल्चर शब्द भी लैटिन के ‘कुल्टुर’ शब्द से आया हुआ है। इसीलिए लोगों को साधारणतया ऐसा लगता है कि यदि किसी राष्ट्र की संस्कृति पर बल दिया गया तो उसका परिणाम सारी दुनिया के लिए वह घातक सिद्ध हो सकता है। किंतु यह पूर्ण सत्य नहीं कहा जा सकता। कोई भी एक व्यक्ति, जो संस्कृति का नाम लेकर कोई एक ग़लत बात कर ले, ऐसी ही बहुत सी चीजों का नाम लेकर दुनिया में जो कोई ख़राब काम करने वाले हैं, यदि वे कोई ख़राब काम करते हैं, क्या इसके कारण हम उन अच्छी-अच्छी चीज़ों को छोड़ दें? तो इसका थोड़ा सा विचार करने की आवश्यकता है कि हम इस अच्छे भाव को छोड़कर चलें क्यों?

इसका विचार हमें दो आधारों पर करना पड़ेगा। पहला आधार तो यह है कि क्या दूसरे लोगों ने इन चीजों का दुरुपयोग किया है? तो क्या हम उसी आधार पर इसे छोड़ दें? दूसरा, यानी हम छोड़ना भी चाहें, तो छोड़ सकते हैं क्या? यह शायद दूसरा भी विचार ऐसा है कि जिस पर हमें विचार करने की आवश्यकता है। अब तीर्थों में बहुत से लोग हैं, वहां सब प्रकार की बुराइयों के अड्डे भी हैं। केवल इसी कारण वहां नहीं जाना चाहिए, ऐसा कोई निर्णय कर ले। काशी के बारे में एक कहावत है कि ‘रांड़, सांड़, सीढ़ी, संन्यासी–इनसे बचे सो सेवे काशी।’ यानी ये जो चारों चीजें हैं, इनसे व्यक्ति अगर बच गया तो समझो काशी का लाभ उठा सकता है। वहां रहकर जीवन भी भलीभांति व्यतीत कर सकता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति वहां की ये चारों बुराइयां ही देखे और काशी जाने का विचार त्याग दे, तो शायद यह ठीक नहीं होगा। वह काशी का लाभ उठाने से वंचित हो जाएगा। यदि देखा जाए तो दुनिया में ऐसी अच्छी चीज़ कुछ भी नहीं है, जिसका दुरुपयोग करनेवाले इस दुनिया में न हों।

राष्ट्रीयता का दुरुपयोग करनेवाले लोग इस दुनिया में पैदा हो गए। धर्म के नाम पर दुनिया में बड़ी-बड़ी लड़ाइयां हुईं। आज तो साइंस सबका देवता बना है। यहां विज्ञान के नाम पर क्या हो रहा है? यह तो हम देखते चले जा रहे हैं। आज इसी विज्ञान ने हाइड्रोजन बम बनाया है। अब क्योंकि विज्ञान ने बहुत सी घातक चीजों का भी आविष्कार किया है, तो क्या हम इन चीजों को छोड़ दें, विज्ञान को छोड़ दें? तो इस प्रकार कोई न कोई चीज़ किसी हित के लिए बनाई जाती है, तो वह कोई न कोई नुक़सान भी करेगी। इसी प्रकार जर्मनी ने यह काम किया भी तो दूसरे लोग भी इस प्रकार का काम करेंगे। तीसरे लोग भी इस प्रकार का काम करेंगे, बाक़ी के राष्ट्र भी करेंगे। इसीलिए अपने को यह नहीं करना चाहिए-ऐसा सोचकर चलना बिल्कुल गलत चीज़ है।

वास्तविकता यह है कि जब हम विचार करते हैं कि संस्कृति के अंदर कोई विशेषता है। संस्कृति के अंदर कोई अच्छी वस्तु है तो हमें उसकी आराधना करनी पड़ेगी, उसके ऊपर खड़ा होना पड़ेगा और जैसा कि हमने अभी तक विचार किया, हमने यह देखा कि संस्कृति वहीं से प्रारंभ होती है, जब व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर परार्थ भाव से अपने जीवन का निर्माण करता है, जीवन की क्रियाओं का निर्धारण करता है। जहां स्वार्थ आ जाता है, वहां किसी प्रकार की संस्कृति नहीं आती और यदि किसी स्वार्थी व्यक्ति के राष्ट्र की भावना का दुरुपयोग किया है, तो वह संस्कृति के लिए दोषारोपण की चीज़ नहीं, यह स्वार्थ है जो कि संस्कृति का अंग बनता ही नहीं। संस्कृति कभी विश्व के लिए घातक नहीं होती। वास्तविकता यह है कि संस्कृति सदैव दूसरे के लिए योजक होती है। एक व्यक्ति के जीवन में जब सांस्कृतिक भाव आता है, तो वह दूसरे के साथ मिलकर एकरूप होकर, दूसरे के मेल का विचार करता है। वैसे ही जब राष्ट्र भी संस्कृति के आधार पर जाग्रत् होता है, जब राष्ट्र सांस्कृतिक अधिष्ठान पर खड़ा हो जाता है। जब राष्ट्र संस्कृति को अपने जीवन में लेकर और अधिकाधिक अपनी संस्कृति के ऊपर अपनी संपूर्ण नीतियों का निर्धारण करता है, उसमें एक राष्ट्र दूसरे के लिए सहायक होता है। सदैव लाभकारी ही होता है।

वह कभी हानि नहीं पहुंचाता। हमने अपने जीवन में बड़े-बड़े साम्राज्य भी देखे हैं। हमारे पास शक्ति भी थी। शस्त्र-बल भी था। परंतु हमने सब बल होते हुए भी अपने जीवन में सांस्कृतिक अधिष्ठान के कारण चढ़ाइयां नहीं कीं। सिकंदर के समान जो यहां से विश्व-विजय की कामना लेकर चला, हम अपने संपूर्ण इतिहास में देखते हैं तो यह पता नहीं चलता कि कोई (केवल लड़ाई में जीतने के लिए) सिकंदर के समान हमारे यहां से निकलकर गया। हमारे सामने वह इतिहास नहीं कि जिसमें ऐसा लिखा हो। हमारे यहां से लोग गए, दुनिया में दूर-दूर स्थानों पर जाकर उन्होंने शिक्षा दी, उन्हें ज्ञान का मार्ग बताया, संस्कृति के बारे में सिखाया व उसकी विशेषताओं को बताया। परंतु हमारे यहां से हाथ में परम पवित्र भगवा ध्वज को लेकर बड़े-बड़े सेनानी दूर-दूर विदेशों में भारत की सीमाओं को लांघकर विजय पाने के लिए नहीं गए। भगवा ध्वज को हाथ में लेकर भारत के संन्यासी और साधु, संत और महर्षि दुर्लंघ्य घाटियों को लांघकर अथाह समुद्र को पार करके दूर-दूर देशों में जाकर वहां के लागों के साथ वहां के जीवन के साथ एकरूप हो गए और उनको भी इस संपूर्ण संस्कृति का ज्ञान दिया।

साधारणतया जो मानव प्रकृति है, वह उसका पशु-जीवन है। उस पशु-जीवन से ऊपर उठाकर उसे मानव के सहारे जीवित रहना सिखाते और मानव से उसे देवता बनाने का प्रयास करते चले गए। यह प्रयत्न हमारे महापुरुषों ने अवश्य किया है। हमारे सामने यह उदाहरण है और जब यह उदाहरण सामने है तो किसी को चिंता करने की आवश्यकता नहीं कि हम अपनी संस्कृति के बल पर खड़े हो जाएंगे तो क्या होगा?

दूसरा भी हमारे सामने एक विचार आता है। जीवन की जो वास्तविकताएं हैं और व्यावहारिकताएं हैं, जिनके आधार पर हम खड़े हैं। दुनिया में मानव की एकता एक अच्छा नारा है। यह एकता एक अच्छा सपना भी है, जिसका बहुत सुंदर आदर्श भी हो सकता है। किंतु विचार करें, मानव की एकता का अर्थ क्या है? उसका आधार ढूंढे तो पता लगेगा कि दुनिया ने इस एकता का नारा लगाया, परंतु मानवता के आधार का कभी विचार नहीं किया। उन्होंने तो ऊपर-ऊपर से सारी चीजें लेकर कहा कि मानव को एक हो जाना चाहिए। कोशिशें भी भिन्न-भिन्न कीं। बाहरी एकता, केवल इसी का विचार किया। लोगों ने सोचा कि मानव को हम एक कर लेंगे, अर्थात् सारी दुनिया के मानव एक ही समय पर भोजन करने आ जाएं तो सारी दुनिया के मानव केवल काबा की तरफ़ मुंह करके नमाज पढ़ने लगेंगे। सारी दुनिया के लोग स्वीकार करें तो सारी दुनिया का मानव एक हो जाएगा। परंतु जरा हम सोचें कि सारी दुनिया के मानव को एक बनाना कैसे होगा, यह कैसे हो सकता है?

सच तो यह है कि एकता हमें प्राप्त हो सकती है। एकता जो मानव के अंदर की शक्ति है, उस शक्ति का आधार लेकर मानव के अंदर जो एक सत्ता छिपी है, उसका विचार करें। उसका विचार कर उसके अंदर व्याप्त होने वाली एक ज्वलंत चेतनमयी शक्ति लेकर जब हम चलते हैं, तभी शायद मानव की एकता का विचार कर सकते हैं। मानव के आगे जो सृष्टि दिखाई देती है, उस सृष्टि का, जिसका वह उपयोग करता है, हमने विचार किया है। यह मानव की एकता एक स्वार्थमयी भावना से पैदा नहीं हुई है, जिसमें मानव दुनिया का संपूर्ण उपभोग करने के लिए पैदा हुआ है। मनुष्य भोक्ता है, बाक़ी की सारी सृष्टि उपभोग की वस्तु है-ऐसा विचार आ जाएगा। मानव इसको अपने सुखों के लिए उपयोग करता है। इसलिए संपूर्ण सृष्टि को स्वार्थ व उपभोग के लिए माना जाए-ऐसा विचार करनेवाली पश्चिमी सभ्यता की ही दृष्टि है।

उनकी अधिकाधिक व्यापक दृष्टि केवल यहां तक आकर पहुंची कि हम मानव की एकता का विचार करें, सब चीजों का उपभोग करें। इसीलिए उन्होंने सोचा, खाते चलो। अर्थात् जो फल है, उसे खाओ, बाक़ी की सारी चीजों को खाओ, पशु-पक्षी जो दिखाई देते हैं, उन सभी को खाओ। दुनिया में न खाने वाला कुछ भी नहीं। एक सज्जन तो यहां तक कह रहे थे कि दो पैरों वाले आदमी और चार पैर वालों में चारपाई छोड़कर और सब कुछ खा सकते हैं। इस प्रकार से दो पैर वाले आदमी को ही क्यों छोड़ें? चारपाई तो शायद खाई नहीं जा सकती, इसलिए छोड़ा। सबको खाने की यह जो भावना दिखाई पड़ी है, यह मनुष्य की भोगमयी, स्वार्थमयी प्रवृत्ति है। इसके आगे भी तो विचार किया जा सकता है।
क्रमश:…