संस्कृति और समाज


दीनदयाल उपाध्याय

गतांक का शेष…

लेकिन कभी जब व्यक्ति प्रकृति का पालन नहीं करता, तब गड़बड़ हो जाती है। जैसे भोजन कर लिया है, फिर भी यदि किसी ने आग्रह किया तो सोचा कि जब यह इतने प्यार से आग्रह कर रहा है तो चलो थोड़ा सा और खा लें। उस वक्त यदि अपने संकोची स्वभाव का परिचय दे दिया और ज्यादा खा लिया तो इसका परिणाम होता है कि पेट ख़राब हो जाता है और पाचन शक्ति ख़राब हो जाती है। यानी यह सब हुआ प्रकृति का अतिक्रमण करने के कारण। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है कि इसकी कमी भी हो जाती है। जहां प्रकृति की कमी होती है, वहां भी गड़बड़ हो जाती है। एक बार की बात याद आती है कि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के एक मित्र ने उनसे कहा कि तुम्हें देखकर लगता है कि जैसे इंग्लैंड में अकाल आ गया है। इस पर शॉ ने उत्तर दिया कि मि. चैस्टर्टन, तुम्हें देखकर अकाल का कारण भी लोगों की समझ में आ जाएगा। यानी एक ओर यदि प्रकृति का अतिरेक है तो दूसरी ओर कमी हो जाती है। तो प्रकृति के अतिरेक को बचाना चाहिए, यह किसी-किसी रूप में प्रभाव डालेगा ही। इसी को लोग विकृति कहते हैं।

यह विकृति है यानी स्वस्थ प्रकृति नहीं है। यह प्रकृति ठीक रहे, स्वस्थ बनी रहे, इसके लिए कार्य करना चाहिए। जहां-जहां प्रकृति का ठीक-ठीक पालन नहीं किया जाता, वहां पर विकृति आ जाती है। इस विकृति को रोकना एक नितांत आवश्यक चीज़ है। विकृति को रोककर प्रकृति को ठीक-ठीक बनाए रखना-यह काम धर्म का है। यह पहली चीज़ है, इसलिए संस्कृति जिस पहली सीढ़ी से चढ़ती है, वह धर्म की ही सीढ़ी है।

धर्म धारण करने से है-ऐसा अपने यहां कहा गया है। समाज में किसी भी व्यक्ति की धारणा, उसका अस्तित्व धर्म के कारण ही बना रहता है। यह प्रकृति स्वस्थ बनी रहे तो धारणा बनी रहती है और उसमें कोई अड़चन भी नहीं आती। विकृति के कारण ही सब बुराइयां आती हैं तथा रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इसके लक्षण हमारे यहां बताए गए हैं। कि जब आदमी आहार-विहार करता है, तब उसके कारण कुछ रोग उत्पन्न हो जाते हैं। यदि हमारा आहार-विहार ठीक रहे, हम प्रकृति के नियमों का पालन करते रहें, तो हम रोगों से मुक्त रहेंगे। यहां पर वास्तव में धर्म आता है। कई बार मनुष्य अपनी प्रकृति तथा धर्म के अनुसार ठीक चलता है, तब भी कई कार्य ऐसे होते हैं, जिन्हें मनुष्य बिना दस लोगों के नहीं कर सकता। मैं कुछ पैदा करता हूं और जो भी पैदा करता हूं, उसमें सारा, समय लगाता हूं। दूसरा अपना समय अन्न पैदा करने में लगाता है और फिर हम लोग आपस में मिलकर बांट लेते हैं कि मैंने कपड़ा पैदा किया है तो मैं अन्न के बदले में कपड़ा उसे दे देता हैं। इस प्रकार जीवन में व्यवहार चलता है। लेन-देन चलता है। दूसरे के साथ हम लोग सहयोग से काम करते हैं। इसी प्रकार समाज में और भी अनेक अवसर होते हैं, जिसको वास्तव में समाज की व्यवस्था कहते हैं। उसी के आधार पर समाज का जीवन चलता है।

सब लोग अपने-अपने कर्त्तव्य का ठीक-ठीक पालन करें, तभी यह व्यवस्था ठीक प्रकार चल सकती है। जब व्यवस्था में कुछ गड़बड़ होती है तो उसका समाधान भी खोज लिया जाता है। जैसे एक सड़क पर मोटर-गाड़ियां चलती हैं। सड़क तंग है तो उसके लिए भी कुछ नियम बनाने की जरूरत है। किसी से किसी की टक्कर न हो जाए, इसके लिए कुछ नियम बनाने पड़ते हैं। दस लोग जब एक साथ एक जगह बैठते हैं तो उनके आपस के संबंध किस प्रकार ठीक रहेंगे, इस प्रकार की व्यवस्था करनी पड़ती है। इस तरह की व्यवस्थाओं को देखते हुए प्रकृति के लिए भी यह व्यवस्था आवश्यक हो जाती है। प्रकृति को स्वस्थ बनाए रखने के लिए अपने प्राकृतिक हितों का संपादन कर सकें, इस हेतु व्यक्तिगत और सामूहिक आधार पर प्रयत्नों की आवश्यकता होती है कि व्यक्ति इन नियमों का ठीक-ठीक संपादन कर सके। अतः राज्य आता है।

राज्य यह देखता है कि दूसरे राज्य के लोग लोगों को ठगते हैं, पीड़ा पहुंचाते हैं। और उनका शोषण करते हैं। वे ऐसा न कर सकें, इसीलिए राज्य बीच में खड़ा हो जाता है। उसकी भी व्यवस्था करनी पड़ती है। इस प्रकार जितनी भी व्यवस्थाएं आती हैं, वे धर्म के अंदर आती हैं। ये सब व्यवस्थाएं प्रकृति के आधार पर आती हैं। यह सब काम धर्म के आधार पर होता है। जब हम केवल व्यक्तिगत प्रकृति पर ही ध्यान देते हैं, यानी अपनी इंद्रियां, मन और बुद्धि का ही विचार करते हैं और अपनी प्रकृति का विचार नहीं करते तब वास्तव में संस्कृति आती है। संस्कृति प्रकृति की व्यवस्था ठीक प्रकार से रखती है। यह धर्म से एक क़दम आगे आती है। हर पीढ़ी में व्यक्ति की प्रकृति को ठीक बनाए रखना है। व्यक्ति की प्रकृति को समाज विरोधी न बनाना सामूहिक कर्त्तव्य द्वारा उसे कैसे पूर्ण किया जाए, कैसे स्वस्थ रखा जाए-ये सब कार्य संस्कृति के हैं।

इसके अतिरिक्त भी जब आदमी काम करता है, जिसमें व्यक्ति की अपनी प्रकृति का कोई विचार नहीं होता, विचार केवल समष्टि का होता है, दूसरे का होता है, जिसमें व्यक्ति परमार्थ भाव से काम करता है, यानी उसकी समष्टि की जो धारणा रहती है, समाज की जो एक विशेषता रहती है, उसके आधार पर जब वह काम करता है, तब वास्तव में संस्कृति प्रारंभ होती है। उस संस्कृति का मोटा-मोटा लक्षण यदि देखें तो यह देख लें कि मैं जो काम कर रहा हूं, वह मेरे अपने स्वार्थ में है क्या? यानी स्वार्थ का काम बुरा है, ऐसा मानने की भी ज़रूरत नहीं। स्वार्थ प्रकृति की रक्षा के लिए कुछ अंशों तक आवश्यक रहता है। जैसे कोई कहेगा कि वह अपने लिए रोटी खाता है। रोटी खाने से कोई स्वार्थी कह दे, तो यह ठीक नहीं। इस अंश तक तो स्वार्थ का पालन करना ज़रूरी है। यह कोई ग़लत चीज़ नहीं, ख़राब नहीं, इसके लिए किसी का बुरा मानने की ज़रूरत नहीं।

अपने यहां स्वार्थी शब्द ख़राब माना जाता है। लेकिन वास्तव में यह ख़राब वहां होता है, जब कोई अपने स्वार्थ के लिए अन्यों को बाधा पहुंचाता है। केवल जो अपना स्वार्थ पूरा करते हैं और उससे किसी को कोई नुक़सान भी न हो रहा हो तो वह बुरा नहीं है। यह साधारण प्रकृति है, सभी अपने लिए कार्य करते हैं। जब कोई दूसरे का बिगाड़कर अपना काम करता है, तब कहा जाता है कि वह स्वार्थी है, लेकिन जब हम संस्कृति का विचार करते हैं तो हमें यह विचार करना पड़ता है कि यह काम जो कुछ होगा, परमार्थ भाव से होगा। दूसरों की भावनाओं से होगा। इसका विचार आ जाए कि इसके लिए मैं काम कैसे करूं? जहां पर यह विचार आ जाएगा, वहां पर हम कहेंगे कि हम जो कर्म कर रहे हैं उसकी प्रेरणा अपनी संस्कृति से पाते हैं। अब यह दूसरे के भले का विचार करना मुख्य चीज़ है। नहीं तो कई बार ऐसा हो जाता है कि चार लोगों का काम करना अपने स्वार्थ के लिए भी हो सकता है। सामूहिक स्वार्थ का विचार करके भी हम कार्य कर सकते हैं।

सामूहिक स्वार्थ में हम यह भी सोचकर चल सकते हैं कि इसमें क्या है, सारा हिंदुस्थान ऊंचा उठाया गया तो हम भी ऊंचे उठ गए। डाकुओं का झुंड भी दूसरों के लिए काम करता है, वहां भी उनके लिए एक अनुशासन का पालन होता है। अतः जहां ऐसी चीजें होती हैं, उसे हम सांस्कृतिक नहीं कहते । जहां हमारे कार्य की प्रेरणा बिल्कुल निस्स्वार्थ हो और इसके लिए परमार्थ से भी ज्यादा अच्छा शब्द होगा कि हम बिल्कुल निस्स्वार्थ भाव से काम करें और उस निस्स्वार्थ भाव में हम एक महान् ध्येय सामने रखें। एक जीवन से दूसरे जीवन को सुखी बनाने की कल्पना सामने रखकर काम करें। उसमें इतना भी स्वार्थ न हो कि उसको सुखी करने में अपने को आनंद होता है। नहीं तो कई बार ऐसा होता है कि दूसरे को सुखी करने में अपने को आनंद होता है।

हम अपने घर में किसी को बुलाते हैं और बुलाकर उसको खिला-पिलाकर उसका आदर-सत्कार करते हैं, लेकिन मन में यह भाव छिपा रहता है कि चलो, मैंने इसका आदर सत्कार किया है, यह कम-से-कम इतना तो कहेगा कि आदमी बड़ा भला है। यह दूसरों का बड़ा आदर करता है। अतिथि सेवा करने में यह बड़ा रत है। मन के अंदर जो यह आनंद वाली चीज़ है, यह तनिक भी न आए। यह भाव भी मन में न आए, तब हम कहेंगे कि हमारा संस्कृति का भाव जाग्रत् हुआ। हमारे घर में आने वाले व्यक्ति की जब हमने अच्छी प्रकार से सेवा-सुश्रुषा कर दी, यह सोचकर कि आज हम उसे खिला दें तो कल शायद वह हमें भी ऐसा ही खिलाए। तो यह सब वह है जहां पर साधारणतया प्रकति का विचार होता है, व्यापार, बुद्धि का विचार होता है। इसमें कोई संस्कृति का विचार नहीं।

जहां पर हम उसकी सब प्रकार से सेवा करें और दो मीठे शब्दों का भी विचार न करें, वही स्थान सबसे ऊंचा है। एक बार एक स्थान पर सत्संग हो रहा था। वहां पर एक सज्जन ने सबके जूते उठाकर रखने का काम अपने पास लिया। पूछने पर उसने कहा कि इस काम के लिए तो बड़े-बड़े लोग लालायित रहते हैं, पर उनको काम नहीं मिलता और जिसको यह काम मिल जाता है, वह समाज में सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त करता है। मैंने पूछा कि क्या आपने इसलिए यह काम किया है। तो उन्होंने जवाब दिया कि कुछ भी समझ लीजिए। यानी उनके मन में यह भाव था कि इस तरह की सेवा करने से मैं सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त कर सकेगा। यह निस्स्वार्थ सेवा नहीं है, लेकिन जहां हम परार्थ भाव से स्वतः निस्स्वार्थ होकर काम करते हैं तो हम संस्कृति के ऊपर खड़े होकर काम कर रहे हैं, ऐसा कह सकते हैं और उसमें से हमारे अंदर की जो विशेषता है, वह प्रकट होती है।

पश्चिम के लोग यह विचार तक नहीं कर पाए। उनकी जो प्रकृति होती है, उसके अनुसार उन्होंने भौतिक जीवन तक ही विचार किया, उसके आगे उन्होंने विचार ही नहीं किया। अतः यह काम कैसे नहीं करना, यह काम कैसे करना, उसकी पद्धति क्या है? कैसे सोचना, इसका एक सीधा सा रास्ता है। यह संस्कृति का विषय जितना भी गहन हो, पर हमारे यहां पर एक पद्धति लगा दी है कि कठिन से कठिन चीज़ को भी व्यक्ति व्यवहार में ला सके, इसके लिए सीधे रास्ते बना दिए। जैसे तुलसीदासजी आए, उन्होंने कहा कि सारी चीजें छोड़कर केवल राम का भजन करो, सब दुःख मिट जाएगा। एक सीधा रास्ता बता दिया। हमने भी एक सीधा-सादा रास्ता निश्चित किया।

अपनी भारतीय संस्कृति से जीवन के अंदर जो गुण प्रकट हो सकते हैं, वे किस आधार पर प्रकट होते हैं? वे तभी प्रकट होते हैं, जब हम परार्थ भाव से जीवित रहते हैं। समष्टि की जो आत्मा है, उसका साक्षात्कार करने का प्रयास करते हैं। जब हम निस्स्वार्थ भाव से व्यक्तित्व का चिंतन करते हुए अपनी प्रकृति को स्वस्थ बनाए रखकर धर्म के आधार पर समष्टि को आगे बढ़ाने को प्रयत्नशील होते हैं, तो उस समय हमारे जीवन में कौन-कौन से गुण प्रकट होंगे, इसका यदि हम थोड़ा सा विचार करें तो मैं कहूंगा कि विचार करने का रास्ता कौन सा है, जिसके प्रति हम यह कह सकते हैं कि अपने धर्म और समाज का संरक्षण कर इसकी अभिवृद्धि करेंगे। वहीं पर हमने इसका रास्ता भी बना दिया और यह कहा कि संघ कार्य निस्स्वार्थ बुद्धि से करेंगे। शेष…

(संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग : कानपुर,
-जून 4, 1959)