किसानों की जमीन न बिकेगी, न लीज पर ली जायेगी और न ही बंधक होगी: रविशंकर प्रसाद


प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार किसानों के प्रति सदैव समर्पित है। केंद्र सरकार कृषि सुधार कानूनों के माध्यम से किसानों के लिए नये-नये अवसर तलाश कर उन्हें उपलब्ध कराना चाहती है, ताकि किसान सशक्त बनें और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर मिलें

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं केंद्रीय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद ने 7 दिसंबर, 2020 को पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में एक प्रेस-वार्ता को संबोधित किया और कृषि सुधारों पर दोहरा रवैया अपनाकर जनता को गुमराह करने की विपक्ष की साजिश पर जमकर हमला बोला।

श्री प्रसाद ने कहा कि किसानों के हित में कृषि सुधारों से संबंधित जो कानून बने हैं, उस पर कुछ किसान संगठनों की कुछ चिंताएं हैं जिस पर सरकार और किसान संगठनों के बीच वार्ता चल रही है, लेकिन इस बीच अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए निहित स्वार्थों के कारण कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल किसानों की मांग की आड़ में उन्हें गुमराह करते हुए अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने लगे हैं। यह ऐसी पार्टियों के शर्मनाक चेहरे और दोहरे रवैये को उजागर करता है।

श्री प्रसाद ने कहा कि कृषि सुधारों ने किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं। बरसों से किसानों की जो मांग थी, जिन मांगों को पूरा करने के लिए किसी न किसी समय में हर राजनीतिक दल ने उनसे वायदा किया था, वो मांगें पूरी हुई हैं। काफ़ी विचार विमर्श के बाद भारत की संसद ने कृषि सुधारों को कानूनी स्वरूप दिया। इन सुधारों से न सिर्फ किसानों के अनेक बंधन समाप्त हुये हैं, बल्कि उन्हें नये अधिकार भी मिले हैं, नये अवसर भी मिले हैं। इन अधिकारों ने बहुत ही कम समय में किसानों की परेशानियों को कम करना शुरू कर दिया है लेकिन कृषि सुधारों की बात करने वाली विपक्षी पार्टियां केवल सरकार का विरोध करने के नाम पर किसानों के हित के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। कांग्रेस 10 वर्षों के यूपीए सरकार के दौरान न केवल इन्हीं सुधारों की बात कर रही थी, बल्कि अपने शासित राज्यों में वह बढ़-चढ़ कर इस पर काम भी कर रही थी। आज जब इन विपक्षी दलों का वजूद ख़त्म हो रहा है, पंचायत से पार्लियामेंट तक उनकी हार हो रही है, जनता उन्हें लगातार खारिज कर रही है, इसलिए कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए किसी भी आंदोलन में कूद पड़ती है।

किसान नेताओं ने स्पष्ट कहा है कि राजनीतिक पार्टियां उनके मंच पर न आयें, लेकिन निहित स्वार्थों के कारण ये जबरन उसमें शामिल हो रहे हैं। ये पहला आंदोलन नहीं है जिसका कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए इस्तेमाल किया है। इससे पहले भी सीएए, शाहीन बाग और कई अन्य अवसरों पर ये अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं। कांग्रेस एवं उसकी सहयोगी पार्टियां केवल विरोध के लिए विरोध कर रही हैं और ऐसा करते समय वे पूर्व में किये गए अपने कामों को भी भूल जाती हैं।

श्री प्रसाद ने कहा कि आज मैं अकाट्य सबूतों के आधार पर कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों के शर्मनाक चेहरों को उजागर कर रहा हूं जिन्होंने कांग्रेस की यूपीए सरकार के दौरान कृषि सुधारों का समर्थन किया था लेकिन आज वही पार्टियां उन सुधारों का विरोध कर किसानों को गुमराह कर रही हैं।

 कांग्रेस ने 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले अपने घोषणा पत्र में एपीएमसी एक्ट में संशोधन का वादा किया था। 2019 के चुनावी घोषणापत्र में कांग्रेस ने कृषि पर किये गए कांग्रेस के वादे के 11वें पॉइंट में स्पष्ट लिखा है कि Congress will repeal the Agricultural Produce Market Committees Act and make trade in agricultural produce – including exports and inter-state trade – free from all restrictions. कांग्रेस का एक और दोहरा रवैया देखिये कि अंग्रेजी में तो ये ‘repeal’ की बात करती है लेकिन हिंदी में घोषणापत्र जारी करते समय ये कहती है कि हम एपीएमसी एक्ट में संशोधन करेंगे। इसी तरह कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में Essential Commodities Act (ECA) को एक नए कानून को लाने की बात कही थी। अब जब मोदी सरकार ने किसानों को सशक्त करने के लिए इस एक्ट में संशोधन किया है तो कांग्रेस इसका विरोध कर किसानों को ही भ्रमित रही है।

 कांग्रेस पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को एपीएमसी एक्ट को लेकर दिए अपना बयान याद हो या नहीं, लेकिन आम लोगों को पता है कि 27 दिसंबर, 2013 को लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर फलों और सब्जियों को APMC एक्ट से बाहर करने का ऐलान किया था, ताकि किसान अपनी पैदावार जहां चाहें बेच सकें। कांग्रेस ने इसे अपनी सरकार वाले राज्यों में लागू भी किया था।

 यूपीए सरकार में तत्कालीन केंद्रीय कृषि एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री शरद पवार ने अगस्त, 2010 और नवंबर 2011 के बीच सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर बार-बार मॉडल एपीएमसी एक्ट को लागू करने और स्टेट एपीएमसी एक्ट्स में संशोधन के लिए कहा था और भारत के ग्रामीण इलाकों में कृषि क्षेत्रों के संपूर्ण विकास, रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए बेहतर मार्केट की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने 11 अगस्त, 2010 को दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित एवं नवंबर में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान को इस बारे में पत्र लिखा था जो मीडिया में उपलब्ध है। उन्होंने निजी तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों से अपील की कि किसानों की बेहतरी के लिए बिना देरी करे राज्य सरकारें कदम उठाए। 2005 में पत्रकार शेखर गुप्ता को इंटरव्यू देते हुए शरद पवार ने कहा था कि अगर मंडी सुधार नहीं करेंगे तो उन्हें सरकार का सहयोग नहीं मिलेगा। उन्होंने तो पेनाल्टी लगाने की भी बात कही थी। जब उनसे पूछा गया कि एपीएमसी एक्ट कब तक खत्म होने की उम्मीद है तो शरद पवार ने छः महीने की टाइम लाइन भी बताई थी। उन्होंने कहा था कि राज्यों को एपीएमसी में संशोधन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए वैकल्पिक साधन सुलभ हो सके और निजी व सहकारी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाई जा सके।

 कृषि सुधारों के मामले में स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट आई है जिसमें श्री मुलायम सिंह यादव भी मेंबर हैं और मैं मानता हूं कि वे समाजवादी पार्टी की नीतियों की आखिरी आवाज हैं। इस रिपोर्ट में भी स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि यह बहुत जरूरी है कि किसानों को मंडियों के चंगुल से मुक्त किया जाय। समाजवादी पार्टी हो या शिव सेना, इन्होंने क़ानून पारित होते समय संसद में सैद्धांतिक रूप से अपनी मंजूरी दी थी।

 एपीएमसी में सुधार को लेकर योजना आयोग ने भी गहन विचार-विमर्श किया था और इस पर अपनी रिपोर्ट दी थी। योजना आयोग ने 2011 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि एपीएमसी सिस्टम में तत्काल सुधारों की जरूरत है और मॉडल एपीएमसी एक्ट में प्राइवेट सेक्टरों की भी भागीदारी को अनुमति दी गई है, ताकि किसानों को अपने हिसाब से अवसर मिले और उन्हें लाभ पहुंचे। योजना आयोग ने इस रिपोर्ट में कहा था कि एपीएमसी में सुधार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इस उद्देश्य के लिए किसानों को बेहतर ग्रामीण ढांचा मुहैया कराए जाने की जरूरत है। साथ ही, भंडारण और खाद्य प्रसंस्करण सुविधाओं को भी बेहतर बनाया जाना चाहिए।

 2007-2012 के मध्य कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए मनमोहन सरकार ने कानून बनाए थे जिसे उस वक्त आंध्र प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, राजस्थान, सिक्किम और तेलंगाना जैसे राज्यों ने लागू किया था, ताकि किसानों को नए अवसर मिलें और उनकी आय बढ़े। इसमें से कई राज्यों में उस वक्त कांग्रेस सरकार थी।

 यूपीए सरकार ने एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में 2006 में कृषि सुधारों पर एक कमीशन गठित की थी जिसने नियंत्रण मुक्त कृषि बाजार की भी जरूरत बताई थी। यूपीए सरकार ने 2010 में पाटिल कमिटी गठित की थी जिसने 2013 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में नियंत्रण मुक्त कृषि बाजार, कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग, पोस्ट हार्वेस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत बताई थी।

 मोदी सरकार के तीन वर्ष पूरे होने पर योगेंद्र यादव के स्वराज अभियान ने सरकार पर एपीएमसी में सुधार से हाथ खींचने का आरोप लगाया था, लेकिन जब ये संशोधन हुए हैं तो वे विरोध कर रहे हैं।

 अरविंद केजरीवाल सरकार ने 23 नवंबर, 2020 को कृषि सुधार कानून को दिल्ली में नोटिफाई किया था लेकिन आज विरोध कर रहे हैं।

 पंजाब की कांग्रेस सरकार तो फूड प्रोसेसिंग क्षेत्र में पेप्सिको जैसे प्राइवेट प्लेयर को मौके दे रही है लेकिन जब हम किसानों के हित में ही इसका कानून बनाते हैं तो कांग्रेस विरोध करने लगती है।

श्री प्रसाद ने कहा कि मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में जो पार्टियां शामिल थीं या फिर जिन्होंने समर्थन दिया था, उनमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, डीएमके, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, लेफ्ट और टीएमसी समेत कई राजनीतिक दल थे। उस दौरान इन सभी पार्टियों के लोगों ने इस किसान बिल को लेकर अपना समर्थन दिया था, परंतु आज ये सभी पार्टियां कांग्रेस के साथ मिलकर इसका विरोध कर रही हैं। किसानों का अहित करने में ये सभी पार्टियां बराबर की दोषी हैं। किसान आंदोलन से जुड़े नेताओं ने प्रारंभ से ये कहा कि इसमें पॉलिटिकल पार्टियों को एंट्री नहीं देंगे, परंतु आज जो हो रहा है, उससे किसान हितों को समर्पित और जीवन भर किसानों की सेवा करने वाले लोगों को भी गहरा धक्का लगा है।

श्री प्रसाद ने कहा कि किसान कुछ निहित स्वार्थों की राजनीति के चंगुल में फंसे हुए हैं। छोटे और मंझोले किसानों को हम उनके फसल और बाजार के लिए पर्याप्त अवसर देना चाहते हैं। मैं एक बार पुनः स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि किसानों की जमीन न बिकेगी, न लीज पर ली जायेगी और न ही बंधक होगी। उनके जमीन पर कोई देनदारी नहीं होगी। देश के जो छोटे-मंझोले किसान समय के अनुसार बदलना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं, उन्हें अवसर क्यों न मिले? उन्होंने ई-नाम के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि अब तक ई-नाम प्लेटफ़ॉर्म पर 1000 मंडियों, 1.68 करोड़ किसानों और 1.51 लाख ट्रेडर्स ने रजिस्ट्रेशन कराया है और इसके माध्यम से अब तक 1.15 लाख करोड़ रुपये का व्यापार हुआ है। उन्होंने कहा कि कृषि सुधार क़ानूनों के लागू होने के बाद भी 6 खरीफ फसलों और रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि की है। नवंबर अंत तक लगभग 60 हजार करोड़ रुपये के 318 लाख टन धान का प्रोक्योरमेंट किया गया है। इसका लगभग 64% अर्थात् 202 लाख टन धान का प्रोक्योरमेंट केवल पंजाब से किया गया है। यदि हमारा मंडी और एमएसपी ख़त्म करने का इरादा होता तो क्या धान की इतनी बड़ी खरीद होती क्या?

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार किसानों के प्रति सदैव समर्पित है। केंद्र सरकार किसानों के लिए नये-नये अवसर तलाश कर उन्हें किसानों के लिए उपलब्ध कराना चाहती है ताकि किसान सशक्त बनें और उन्हें आगे बढ़ने के अवसर मिलें।

श्री प्रसाद ने कहा कि हम विरोध के नाम पर विरोध करने की नीति और अपना राजनैतिक अस्तित्व को बचाने देश के किसानों को गुमराह करने के कांग्रेस एवं उसकी सहयोगी पार्टियों के साथ-साथ कुछ अन्य विपक्षी दलों के कृत्य की कड़ी भर्त्सना करते हैं। विपक्षी पार्टियां किसानों को भ्रमित करने में लगी हैं। हमारा स्पष्ट मानना है कि संसद द्वारा पारित किये गए तीनों कृषि सुधार विधेयक किसानों की मजबूती एवं उनकी आय को बढ़ाने के लिए हैं। सरकार खुले मन के साथ हर विषय पर चर्चा के लिए तैयार है।