भारतीय विचारधारा सहयोग एवं परस्परपूरकता पर आधारित


दीनदयाल उपाध्याय

जीवित रहने की वृत्ति के कारण ही एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को हड़पना चाहता है। यह वृत्ति हमारे जीवनादर्श में नहीं है।

भारत और पश्चिम के विचारों में मूलभूत अंतर है हम समाज की अनेक इकाइयों में सामंजस्य मानकर चलते हैं और पश्चिम में विरोध को महत्त्व दिया गया है उनकी कल्पना है कि संपूर्ण मानव जीवन संघर्षमय है। सृष्टि इसी संघर्ष के आधार पर टिकी हुई है। उनका समूचा जीवन-दर्शन प्रतिस्पर्धा पर आधारित है। भारत की सारी विचारधारा सहयोग और परस्परपूरकता पर आधारित है। हम प्रत्येक सामाजिक इकाई को उसकी पूर्णता में देखते हैं, पर वे उसे पूर्णता में नहीं देखते। हम व्यक्ति के शरीर को भौतिक आवश्यकताओं का पुंज नहीं मानते। हमने उनको बौद्धिक, मानसिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं को भी महत्त्व दिया है। परंतु पश्चिम में अधिकांश लोग शरीर की भौतिक आवश्यकताओं के बीच संघर्ष की स्थिति मानते हैं। इसमें ये भौतिक आवश्यकताओं को प्रमुखता प्रदान करते हैं। यह सत्य है कि व्यक्ति और समाज में संघर्ष के क्षण आते हैं, परंतु यह स्थिति स्वाभाविक नहीं, असामान्य है यह स्थिति धर्म की नहीं, यह तो विकृति है।

इस संघर्ष की मान्यता के कारण पश्चिम में दो प्रकार के चिंतक मिलते हैं। एक तो वे हैं, जो व्यक्ति को प्रमुख मानते हैं, समाज को गौण मानकर चलते हैं, वे समाज को वहीं तक मानते हैं, जहां तक वह व्यक्ति के हितों की रक्षा करता है।

दूसरे प्रकार के विचारक समाज को श्रेष्ठ और व्यक्ति को गौण मानते हैं। ये व्यक्ति की सत्ता को एकदम समाप्त कर देना चाहते हैं। ये मानते हैं कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समाज का हित साथ-साथ नहीं चल सकते। दोनों में से हमें एक हो चुनना होगा।

डार्विन के ‘शक्तिशाली ही जीता है’ के सिद्धांत के आधार पर उन्होंने अपने जीवन की रचना की। इसीलिए वहां केवल अपने स्वार्थ के लिए लड़ाई और होड़ है। प्रत्येक एक-दूसरे को अविश्वास की दृष्टि से देखता है। वहां दो व्यक्ति आपस में इसलिए मिलते हैं कि उनके समान स्वार्थ हैं। पूंजीपति एक साथ है तो मजदूर एक साथ। राष्ट्र के संबंध में भी स्वार्थ की भूमिका छिपी रहती है। वे समान स्वार्थ के व्यक्ति समूह को ही राष्ट्र मानते हैं।

पश्चिम में प्रत्येक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहता है। यहां पति-पत्नी के अधिकारों की लड़ाई चलती है। प्रेम विवाह होते हैं, फिर भी संघर्ष बना रहता है। हमारे यहां विवाह मां-बाप कराते हैं, फिर भी संघर्ष नहीं होता है। जहां सचमुच का प्रेम है, वहां संघर्ष हो ही नहीं सकता। हमारी प्रेरणा अधिकारों की नहीं, कर्तव्य की है। हम कर्तव्य को आधार लेकर चलते हैं। हम सेवा का विचार करते हैं, अपनी एकात्मकता और सहिष्णुता का अनुभव करते हैं। हम दूसरे की बात को भी सच्ची मानकर सुनते हैं।

धर्म संघर्ष से नहीं सामंजस्य से उत्पन्न होता है। एक-दूसरे के जीवन से एकात्म होना ही धर्म होता है। महाभारत में धर्म-अधर्म की बड़ी सरल व्याख्या की गई है। मम यह अधर्म है। ‘न मम’ यही धर्म है। मेरा कुछ नहीं, सब तेरा है, यही धर्म है। सब कुछ मेरा है, यही अधर्म है। इससे अहंकार जाग्रत् होता है। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति स्वयं को केंद्र मानकर संपूर्ण समाज का विचार करता है।

यदि संसार को चलाना है तो ‘न मम’ का विचार करना होगा। इसी को अपने यहां ‘यज्ञ’ कहा गया है। यज्ञ का अर्थ हवनकुंड नहीं। उसमें आहुति डालना यह यज्ञ का प्रतीक है, यह यज्ञ भाव जगाने की एक पद्धति है। यह संस्कार डालने का एक तरीका है। इसीलिए आहुति के समय कहते हैं कि यह मेरा नहीं देवता का है। जो प्रसाद में मिलता है, उसे ही हम ग्रहण करते हैं। यह त्याग का भाव है। मैं अपने लिए नहीं, दूसरे के लिए हैं, यही अपनी जीवनदृष्टि है।

व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज के हित में दोनों में मेल होना आवश्यक है, व्यक्ति को स्वतंत्रता मिली है। उस पर कोई रोक नहीं है, पर यदि वह स्वतंत्रता का उपयोग अपने लिए ही करेगा तो ग़लत होगा। व्यक्ति को अपने लिए ही नहीं समाज के लिए भी जीना चाहिए। यदि ऐसा हुआ तो वह समाज की सेवा का प्रयत्न करेगा।

हम रहें, हमारा राष्ट्र रहे और बाकी के लोग समाप्त हो जाएं, यह कल्पना अत्यंत घातक है। हम अपने राष्ट्र का वैभव चाहते हैं, पर यदि उस वैभव को कोई देखनेवाला न रहा तो हमारा वैभव किस काम का?

स्वयं जीवित रहने की इस वृत्ति के कारण ही एक राष्ट्र को हड़पना चाहता है, यह वृत्ति हमारे जीवनादर्श में नहीं है। हम न तो प्रकृति का शोषण करते हैं और न राष्ट्र का ही। हम गाय को मां मानते हैं। उसका दूध प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। गंगा को मां मानते हैं, उसका जल पीकर अपने को धन्य समझते हैं। हमारे यहां मां-बहिनें घर का काम करती हैं। तो पश्चिम के लोग यह मानते हैं कि हम स्त्रियों का शोषण करते हैं। यह भाव गलत है। मां पुत्र की सेवा करती है, उसका शोषण नहीं होता है। यह मां की ममता है। बहन का स्नेह है, जिसके कारण वह कार्य करती है। हम ज्ञानी होंगे और सारी दुनिया मूर्ख रहेगी, ऐसा हम नहीं सोचते। हमने अपने समक्ष विश्व को आर्य बनाने का, श्रेष्ठ बनाने का सिद्धांत रखा। अपने ज्ञान को छिपाया नहीं, समूचे विश्व में फैलाया है। संसार के सब लोग मानव बने, मानवोचित व्यवहार करें। यही हमारे जीवन का मूलभूत विचार रहा है।

समाज के प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एकात्मकता होनी चाहिए। ऐसा होने से उसका व्यक्तित्व नष्ट नहीं होगा, अपितु और भी विकसित होगा। व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त नहीं होगी, समाज की विराटता में मिलकर और भी विराट हो जाएगी। यदि व्यक्ति ने अपने को समाज से अलग माना तो संघर्ष अवश्य ही खड़ा होगा। वास्तव में व्यक्ति और समाज के बीच में कोई संघर्ष नहीं। यदि संघर्ष आया तो यह दु:ख का ही कारण होता है। हमारे यहां ऐसी कोई संघर्ष कल्पना नहीं है।

आज संसार के अन्य लोग भी समझ रहे हैं कि मानव की एकता आवश्यक है। मनुष्य-मनुष्य के बीच की यह लड़ाई बंद होनी चाहिए, ऐसा सब लोग सोच रहे हैं। पर शायद उन्हें यह पता नहीं कि इस एकता के लिए कौन सा तत्त्व ज्ञान है, जो इसके आधार के रूप में प्रतिष्ठित होगा। हम उसे जानते हैं कि वह तत्वज्ञान कौन सा है? हमें वह प्राप्त करना है। हजारों वर्षों से हम उसे लेकर चले रहे हैं। यदि हम उस तत्त्वज्ञान के साथ चलते रहेंगे तो यह पददलित, हेयराष्ट्र-जीवन एक दिन समाप्त होकर रहेगा।

संसार में हम कुछ करने के लिए पैदा हुए हैं। यह सत्यभाव हम पहचानें। यह सत्यशक्ति के आधार पर ही टिक सकता है, यह भी हम समझे और उसी के आधार पर सारे विद्वेष को समाप्त कर विश्व में सामंजस्य स्थापन का पुण्य कार्य संपन्न करने का संकल्प लें। समूचे समाज में यज्ञभाव उत्पन्न करें जैसे समुद्र का पानी वाष्प बनकर बादल बनता है, फिर बरसकर उसी के पास आ जाता है। वैसा ही भाव हम भी प्राप्त करना प्रकृति से सीखें। प्रकृति के इस भाव के आधार पर ही सृष्टि टिकी है। यदि यह भाव हमारे जीवन में भी आया तो हम देखेंगे कि मानव जीवन में अवश्यमेव शांति आएगी और हमारा तत्त्वज्ञान विश्व की अस्थिरता को समाप्त करने में सहायक सिद्ध होगा।

-संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग : अलीगढ़ (जून 22, 1962)