सांस्कृतिक अधिष्ठान


भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष एवं एकात्म मानववाद के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा 4 जून, 1959 को कानपुर में संपन्न संघ शिक्षा वर्ग में दिए गए बौद्धिक का अंतिम भाग:

दीनदयाल उपाध्याय

आज का कम्युनिज्म भी संपूर्ण मानव की एकता के लिए किए गए प्रयासों में से एक प्रयास है। यह प्रयास आज भी चल रहा है। जहां न धर्म है और न मज़हब है। साम्यवाद ही इनका मजहब है। मार्क्स, लेनिन, स्टालिन तथा खुश्चेव इनके मसीहा हैं। मार्क्स और एंजिल्स के ग्रंथ इनके कुरान हैं। मार्क्स ने पूंजीवाद के अंदर ही क्रांति की भविष्यवाणी कर मानव एकता का एक स्वरूप वर्णित किया है। उसके अनुसार जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड आदि औद्योगिक देशों से ही, जहां आर्थिक विषमता है, यह क्रांति प्रारंभ होने की थी, परंतु हमने देखा कि क्रांति एक ऐसे देश से प्रारंभ हुई, जहां जारशाही से पीड़ित होकर राष्ट्रीयता समाप्त हो चुकी थी और वह भी स्विट्जरलैंड में निर्वासित लेनिन के नेतृत्व में, जो विजेता देश से प्रेरणा प्राप्त किए हुए था। इनका प्रयास भी अपने इन विचारों के प्रसार के लिए आर्थिक विषमता का ही आधार लेकर खड़ा था। परंतु हमने यह भी देखा कि द्वितीय महायुद्ध में जब जापान की हार हो गई तो रूस के लोगों ने यह कहा कि आज जापान से बदला लेने की हमारी इच्छा बहुत दिनों में पूर्ण हुई। इस कथन में भी राष्ट्रीयता की झलक दिखाई पड़ती है।

क्योंकि सन् 1905 की हार के समय तो रूस की साम्यवादी विचारधारा थी ही नहीं, अतः द्वितीय महायुद्ध के परिणामों से बदले की भावना का क्या अर्थ? द्वितीय महायुद्ध में भी जर्मनी से हार के समय उस काल में रूस निवासियों के सामने साम्यवाद अथवा लेनिन और मार्क्सवाद के द्वारा प्रेरित विचार नहीं थे, अपितु रूस के उन्हीं पुराने पुरुषों तथा परंपराओं का सहारा लिया गया, जिनको साम्यवादी आए दिन कोसते रहते हैं। आज रूस द्वारा संचालित साम्यवाद के पीछे रूसी राष्ट्रीयता एवं विचार का ही आधार है। इनकी दृष्टि में राष्ट्र नाम की कोई चीज नहीं। शोषक व शोषित, अमीर व ग़रीब-यही दो वर्ग हैं।

अतः राष्ट्रवाद के स्थान पर विश्व एकता के लिए कोई दूसरा विचार संभव नहीं। जिन-जिन लोगों ने यह स्वप्न देखा, उन्होंने केवल मनुष्य के किसी एक अंग विशेष पर जोर दिया। उनमें से किसी ने पेट देखा, किसी ने रोटी देखी और किसी ने केवल मज़हब का नारा बुलंद कर सारे संसार को उसी के अनुसार बांधने का प्रयास किया। किसी ने ईश्वर के पैगंबर पर श्रद्धा रखकर ही सारे संसार को एक सूत्र में बांधना चाहा। किसी ने एक उपासना पद्धति देखी, किंतु इन सबका विचार करने के बाद ऐसा लगता है कि उन्होंने मनुष्य का विचार केवल ऐकांतिक रूप में किया, केवल एक हस्ती के रूप में किया है।

परंतु मनुष्य में जिस प्रकार विविधता होती है, उसी प्रकार राष्ट्र में भी होती है। मनुष्य के जिस प्रकार से विचार होते हैं, उसी प्रकार राष्ट्र के भी विविध प्रकार के विचार होते हैं। प्रत्येक राष्ट्र के व्यक्ति को इसलिए अपनी विशेषताओं के आधार पर विकास करने को अवसर दिया जाना चाहिए। उसे अपनी विशिष्टताओं के आधार पर प्राकृतिक रूप से बढ़ने का अवसर दिया जाना चाहिए। इस प्रकार से मनुष्य को अपने पराक्रम करने का मौक़ा दिया जाए। उन्हें अपनी प्रकृति के अनुसार विकास का अवसर दिया जाए। संसार में जो संघर्ष है, हमें उसे मिटाने की भी व्यवस्था करनी चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि हम संघर्ष को मिटाने के लिए सभी को मिटाकर उनकी विशिष्टताओं को समाप्त कर दें। वरन् उन सबको एक साथ प्रगति की ओर बढ़ाने की व्यवस्था करें। इसी विचार के आधार पर हमने यह सोचा और हमने ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ को नारा बुलंद किया है।

इसी के अनुसार हमने सारी दुनिया को सभ्य बनाने का काम किया, इसके अनुसार हमने सारी दुनिया को आर्य बनाने का, श्रेष्ठ बनाने का काम किया। इस प्रकार हमारा कभी भी किसी को हिंदू बनाने का तथा किसी को अपना विचार मनवाने का आग्रह नहीं रहा। अपनी-अपनी पद्धति के अनुसार सभी लोग अपने इच्छित गंतव्य की ओर बढ़ेंगे, ध्येय को प्राप्त करने का अवसर प्राप्त करेंगे। हम एक विचार करें कि आज हमारे देश की सेना तीन नामों के आधार पर संगठित है। पहली, वायु सेना व दूसरी स्थल सेना तथा तीसरी जल सेना है। इन तीनों टुकड़ियों में हर एक की अपनी-अपनी अलग विशेषता है। इनके विकास के रास्ते, अपने स्तर, उनके अपने आदर्श हैं व ध्येय हैं, जिनको प्राप्त करने का वे प्रयास करती हैं। उनकी अपनी विशेषता रहती है, जिसके आधार पर वे अपने जीवन को व्यतीत करती हैं। वायु सेना का सैनिक स्थल सेना से यह कभी नहीं कहता कि तुम मेरे अनुसार चलो या वायु सेना के नियमों के अनुसार कार्य करो। स्थल सेना का सिपाही नौ सेना से यह कभी नहीं कहता कि तुम मेरी योजनानुसार काम करो। वे कभी भी अपने विचार या विशिष्टताओं को दूसरों पर लादना नहीं चाहते। परंतु जब देश को आवश्यकता पड़ती है कि देश की सारी सेनाएं देश की रक्षा करें, तो हम देखते हैं। कि सारी सेनाएं अपनी-अपनी विशिष्टताओं के साथ रक्षा करती हैं। सभी देश की रक्षा के लिए एकत्व भाव से एक शरीर के रूप में काम करती हैं और देश की रक्षा में उन सभी का अपना-अपना हाथ होता है।

उसी प्रकार संसार के विभिन्न राष्ट्र भी अपनी विशेषताओं को लेकर आगे बढ़ सकते हैं। विकसित हो सकते हैं। प्रत्येक राष्ट्र का अपना-अपना स्तर, ध्येय, आदर्श हो सकते हैं। जिस प्रकार किसी देश की विभिन्न सेनाएं अपने देश की रक्षा के लिए अपनी विशिष्टताओं का प्रयोग करती हैं और प्रत्येक राष्ट्र की विभिन्नताओं के रहने पर भी उसी प्रकार संसार के सारे देश अपना विकास अपने ध्येय के आधार पर अपने पूर्वजों द्वारा प्राप्त श्रेष्ठताओं के आधार पर कर सकते हैं। हम अपनी-अपनी विशेषताओं को पहचानें और दुनिया में अपना-अपना काम करें। परंतु यह उसी समय हो सकता है, जब हम अपनी विशेषताओं पर खड़े रहेंगे। अपनी विशेषताओं को विकसित करने का प्रयास करेंगे। यह उस समय नहीं हो सकेगा, जब हम अपनी विशेषताओं को भूलकर उनके आधार पर विकास न करना चाहें। ऐसी स्थिति में न तो हम किसी को सहयोग दे सकेंगे और न ही संसार की कोई सेवा कर सकेंगे।

मानव की एकता के नाम पर हम अपनी विशेषताओं को भूलकर त्याग करके हम मानव की एकता क़ायम नहीं कर सकते। इस प्रकार मानव की एकता के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक राष्ट्र अपनी-अपनी विशेषताओं के आधार पर खड़ा हो। आध्यात्मिक आधार पर हमें खड़ा होना है। आध्यात्मिक ज्ञान सारे संसार को देना है, लेकिन हमें संसार को ज्ञान देने के लिए अपने अंदर सामर्थ्य को प्राप्त करना होगा। बिना सामर्थ्य के हम संसार को उस आधार पर खड़ा नहीं कर सकते। हमारे देश का एक महान् संन्यासी कुछ समय पूर्व विदेशों को गया था। उसने वहां पर भारत के महान् दार्शनिकों के ज्ञान को बताया। उनके सामने वेदांत के सिद्धांतों का निरूपण किया। उन्हें वेदांत के पाठ पढ़ाए। इस देश के लोगों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि जिस देश का यह व्यक्ति है, उस देश में इतना बड़ा आध्यात्मिक ज्ञान, इतना बड़ा दर्शन, इतने ऊंचे आध्यात्मिक सिद्धांत हैं, फिर भी वह देश ग़रीब क्यों है, वह देश गुलाम क्यों है? वह देश दासता के बंधनों में क्यों जकड़ा हुआ है? इन सब बातों का विचार करके इन देश के लोगों ने उस महान् प्रचारक स्वामी विवेकानंद से पूछा कि स्वामीजी, आपका देश तो विचारों की दृष्टि से, आध्यात्मिकता के ज्ञान की दृष्टि से अत्यंत प्रगति प्राप्त किए हुए है। परंतु फिर उस देश में इतनी ग़रीबी क्यों है, वह इतना पिछड़ा और गुलाम क्यों है? स्वामीजी इस प्रश्न का कोई संतोषजनक उत्तर क्यों नहीं दे सके।

स्वामी विवेकानंदजी ने इस प्रश्न पर बार-बार विचार किया और विचार करने के बाद उनको यह स्पष्ट लगा कि हमारा देश इतने उच्च गुणों के होते हुए भी पिछड़ा हुआ इसलिए है कि उसके पास सामर्थ्य नहीं है। शक्ति नहीं है। इसलिए उन्होंने सर्वप्रथम सामर्थ्य ही उत्पन्न करने का विचार किया। जब तक हम हिंदुस्थान को सामर्थ्यवान नहीं बनाते, भौतिकता की दृष्टि से सबल नहीं होते, तब तक संसार को इस आधार पर नहीं खड़ा कर सकते। अपने उन उच्च सिद्धांतों की क़ीमत उसी समय होगी, जब हमें वह सामर्थ्य प्राप्त होगी, जिससे हम खड़े होकर एक ऊंचे मंच से जोरदार स्वर में कह सकेंगे कि हमारे पास ऐसे उच्च जीवनयापन के सिद्धांत हैं और सामर्थ्य के आधार पर हम उनको अपने जीवन में प्रकट भी करते हैं। इसीलिए इस सामर्थ्य को प्राप्त करने के लिए किसी कवि ने भारत के युवकों को यह चुनौती दी कि मर्द बनकर पहले हिंदुस्थान के वास्ते जागो, उसके बाद सारे जहां के वास्ते जागो। कविता के द्वारा कवि ने इस ओर इंगित किया है, जब हम सामर्थ्यवान होंगे, तभी संसार की सेवा कर सकेंगे अन्यथा नहीं। इसलिए आज परम आवश्यकता यह है कि हम सामर्थ्य प्राप्त करें।

संघ ने भी यही विचार किया और इस विचार के अनुसार काम भी करना प्रारंभ किया। राष्ट्र की उन्नति के लिए हम बड़े होते चले जाएं। लोक-संग्रह का कार्य करें। सामर्थ्य के होने के बाद भी हम संसार की सेवा कर सकेंगे। सामर्थ्यवान जब परार्थ भाव से कोई काम करता है तो हम उसे सेवा कहते हैं। सेवा वही कर सकता है, जिसके पास इनकार करने की शक्ति हो, जो यह कह सके कि मैं यह काम नहीं करूंगा। वैसा व्यक्ति जब कोई परमार्थ करता है तो उसको हम सेवा कहते हैं। परंतु जब कोई कमज़ोर सेवा करता है तो वह सेवा नहीं होती, बेगार होती है, क्योंकि कमज़ोर के पास सामर्थ्य का अभाव होता है। इसलिए काम करते समय उसकी स्वयं की इच्छा का कोई प्रश्न नहीं होता, क्योंकि कमज़ोर से तो आवश्यकता होने पर भी सेवा कराई जा सकती है। यदि कमजोर जबरदस्ती कराए गए काम को कहता है कि मैंने सेवा की, तो यह बेगार है।

सामर्थ्यवान जब सेवा करता है तो लोग उसे कहते हैं कि उसने सेवा की। राष्ट्र की सेवा में केवल गुणों का ही आह्वान नहीं, वरन् हमें सामर्थ्य का भी आह्वान करना है। वह आह्वान राष्ट्रभाव के आधार पर होगा। मातृभूमि में चैतन्य को उत्पन्न करते हुए हमें प्रगति के मार्ग पर सामर्थ्य के साथ बढ़ना है और हम सब इसी आधार पर विश्वयज्ञ में मानव एकता के लिए आहुति देने को आगे बढ़ सकेंगे। संघ यही कार्य कर रहा है। संघ का कार्य केवल गुणों का आह्वान करना ही नहीं, बल्कि लोक सामर्थ्य का भी निर्माण करना है, जिससे राष्ट्र जीवन के ध्येय को हम संसार में प्रतिष्ठित कर सकें। हमारा संघ यही कार्य करता है। भगवान् हमें संघ कार्य करने के लिए सामर्थ्य दे, ऐसी ही हमारी प्रार्थना है।