राष्ट्र के वैभव में व्यक्ति का वैभव


       (12 जून, 1959 को संघ शिक्षा वर्ग, दिल्ली में दिए गए बौिद्धक का अंतिम भाग)

दीनदयाल उपाध्याय

कुटुंबों में झगड़े कब शुरू होते हैं? जब छोटा भाई सोचता है कि मैं ही सेवा करता हूं, बड़ा भाई तो करता ही नहीं। इसी तरह बड़ा भाई सोचता है कि मैं ही सारी व्यवस्था करता हूं। लेकिन अच्छे परिवारों में ऐसा नहीं होता। दोनों भाइयों को अपना कर्तव्य करना होता है। इसी प्रकार गुरु-शिष्य का संबंध रहता है। थोड़ी भी गुरु ने आदर की अपेक्षा की कि संबंध टूटा। इसी प्रकार पति-पत्नी का भी संबंध रहता है। इस दृष्टि से भी अपेक्षा का भाव आधार नहीं बनाया गया। कर्तव्य के नाते ही सभी काम करते हैं। कर्तव्य में प्रतिदान की भावना नहीं रहती। यहां जैसे को तैसा नहीं चलता। बहन, भाई, पिता, पुत्र, पत्नी, पति-सभी कर्तव्य-बुद्धि लेकर चलते हैं।

शाखा में भी स्वयंसेवक इसी कर्तव्य भाव को लेकर चलता है। मुख्य शिक्षक कहे कि दस विसलें लगाता हूं, फिर भी स्वयंसेवक ध्यान नहीं देते। लो, यह विसल पड़ी है। ऐसा यहां नहीं होता। न ही स्वयंसेवक यह सोचता है कि अभी तो सोया हूं, इसलिए नहीं जाऊंगा। अधिकार की कल्पना का हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं। यहां न तो कार्यवाह कभी इस्तीफ़ा देता है, न स्वयंसेवक ही। जितना हम कर्तव्य भाव से चलते जाएंगे, तो जो लोग हमारे संपर्क में आएंगे, वे भी कल को वैसा ही करने लग जाएंगे।

कर्तव्य यानी हमारा मूक भाव है। इन गुणों के साथ-साथ एक और विशेषता जो जुड़ी है, वह है त्यागशक्ति की। हम अपने हर कार्य की रचना इसके आधार पर ही करते हैं। स्वयंसेवक शाखा में आता है तो वह घर की कुछ बातों को ध्यान से निकालकर आता है। कभी घर वालों के सिनेमा जाने के आग्रह को टालता है। यह ठीक है कि यह त्याग है, लेकिन इसे त्याग की संज्ञा देना भी शायद कठिन हो। रोज़ की शाखा के लिए चाहे छोटा ही क्यों न हो, त्याग करना पड़ता है। एक बार विस्तारक योजना में एक कार्यकर्ता एक स्थान पर गए। वहां पर उसने प्रशिक्षण वर्ग के लिए बातचीत की तो तीनचार लोग तैयार हो गए। मैं भी एक दिन वहां जा पहुंचा। विस्तारक महोदय से पूछा कि क्या हाल है? कहने लगा कि प्रशिक्षण के लिए चार लोग तैयार हैं। अच्छा, जरा उन्हें मिलाओ तो सही। वह उन्हें ले आया। पूछने पर कहने लगे कि हां साहब, वर्ग के लिए तैयार हैं। उनसे खुलकर बात की तो वे कहने लगे कि हम उस कैंप में गए थे तो यह मिला था, वह मिला था। मैंने उन्हें बताया कि भई, यहां तो ऐसा नहीं होता है। यहां तो छोटी-से-छोटी बात का त्याग करना पड़ता है। तन, मन और धन-किसी को भी अर्पण करने को तैयार रहना पड़ता है।

गुरु-दक्षिणा करते समय भी यही भाव रहता है कि मुझे अधिक-से-अधिक अर्पण करना है। यहां न तो ख्याति की इच्छा ही रहती है और न ही नाम घोषित होते हैं। संपूर्ण संस्कृति का त्याग के आधार पर निर्माण किया है। पश्चिम की संस्कृति भोग के आधार पर खड़ी हुई है। यहां तो अधिक-से-अधिक त्याग जो करता है, वही बड़ा माना जाता है। उसी के आगे सभी नत-मस्तक होते हैं। संन्यासी को केवल इसी कारण सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है। शाखा के कार्यक्रमों के द्वारा ये सारे गुण आने लगते हैं।

त्याग का स्वाभाविक परिणाम संयम है। साथ ही तपस्या का गुण निर्माण हो जाता है। अपने सामने जो आदर्श रखा है, उसे पूरा करने के लिए हम निरंतर जुटे रहते हैं। हम कहते हैं कि हम संस्कृति के संरक्षण का कार्य कर रहे हैं। संरक्षण का अर्थ यह नहीं कि संस्कृति नाम की कोई वस्तु किसी कमरे में पड़ी है और हम उस कमरे के चारों ओर रक्षा के लिए खड़े हो जाते हैं। संस्कृति की रक्षा का मतलब यह है इस संस्कृति की जो-जो विशेषताएं हैं, यदि वे अपने जीवन में आती गईं तो कहेंगे कि संस्कृति का संरक्षण हो रहा है। केवल संस्कृति का ज्ञान देनेवाली कुछ किताबों को छापने, विवरण आदि सुरक्षित रखने से संस्कृति की रक्षा नहीं हो सकती। वह कोई संस्कृति की रक्षा का काम थोड़े ही कहा जाएगा।

ऐसी कोई आपत्ति नहीं दिखाई देती कि जिसका कारण इसके विनाश का भय है, परंतु यदि इसके आधार पर जीवन बिताने वाले ज्यादा-से-ज्यादा लोग निकलते हैं तो फिर संस्कृति प्रतिष्ठित है, यह कहा जाएगा। स्वार्थ के आधार पर, व्यापार बुद्धि से कार्य करनेवाले भी दिखाई देते हैं। व्यापार के माध्यम से वेदों की व्याख्या करना, उन्हें पढ़ाना आदि संस्कृति की रक्षा किस प्रकार कह सकते हैं? वह तो बाहरी अभिव्यक्ति मात्र होगी। ऋषियों से प्राप्त आदर्श जब जीवन में प्रकट होंगे, तब संस्कृति की रक्षा होगी। जिन बातों से यह आदर्श जीवन में प्रकट हो सके, ऐसी समाज व्यवस्था की गई। संपूर्ण समाज के प्रति आत्मीयता का भाव, धर्म के प्रति निष्ठा का भाव और त्यागमय जीवन यह हमारे व्यवहार को कसौटी पर कसते हैं। यदि इन जीवन मूल्यों के प्रति अपने जीवन द्वारा श्रद्धा दिखाई और लोगों को लगने लगता है कि यह श्रेष्ठ जीवन है, तब समझो कि संस्कृति का संरक्षण करते हैं।

जहां-जहां हम शाखा लगा देते हैं, वहां-वहां यह भाव खड़ा हो जाता है। चाहे शिशु ही क्यों न हो, सबमें निस्वार्थ भाव से, त्याग भाव से, घर की चिंता न करते हुए राष्ट्र का कार्य करने के लिए तैयारी शुरू हो जाती है। यह बस आत्मिक प्रेम के आधार पर सहज संभव हो पाता है। एक व्यक्ति ने कहा, यह तो आपका स्वयंसेवक है। इसलिए इस झगड़े में तो आप उसका पक्ष ही लेंगे। कार्यकर्ता ने कहा कि ऐसी बात नहीं। बात सुनकर जो ठीक लगेगी, वही कहा जाएगा। पर वह माना नहीं। इस पर कहा गया कि भई, संघ के दरवाजे तो हरेक के लिए खुले हैं। आप भी आएं, तो फिर आपका पक्ष भी शायद लिया जाए। ऐसी लाखों लोगों की धारणा बनी है, स्वयंसेवकों के प्रेम के बारे में।

ऐसा व्यक्ति का संस्कार तो करना ही है, लेकिन इसके साथ ही सामूहिक जीवन की सृष्टि भी करनी पड़ती है। जो गुण एक स्वयंसेवक में रहते हैं, वही गुण व आदर्श कुटुंब में पैदा होंगे। वहां कुटुंब भाव बराबर छाया रहता है। फिर एक कुटुंब, दूसरा कुटुंब इस प्रकार जो सब कुटुबों को मिला या वह उससे ऊपर राष्ट्र का भाव था, वह पोषित होना बंद हो गया। कुटुंब भाव तक ही विचार सीमित हो गया। पहले कुटुंबों ने एक सीढ़ी का रूप धारण किया था। उसके द्वारा ही ऐसे संस्कार मिलते थे कि व्यक्ति, राष्ट्र एवं समाज के लिए निस्स्वार्थ भाव से काम करे, लेकिन जब वही बाधक बन गया तो फिर कुटुंब का सहारा छोड़कर नई पद्धति से राष्ट्रभक्ति उत्पन्न करने का कार्य शुरू किया गया। एकता का भाव जाग्रत् करने का प्रयास किया। प्राचीन काल में वेदों और विविध स्मृतियों ने आदर्शों के आधार पर आचार-धर्म को जन्म दिया। वहां पर हमारे पूर्वजों ने सारे देश में एकता के लिए भी संस्कार दिए। यहां जो समाज के सामने तीर्थों की कल्पना, प्रातः स्मरण और सब आदर्श महापुरुष, जिनके जीवन ने भूमि के एक-एक कण से तादात्म्य स्थापित कर लिया था—इन सबका स्मरण इस एकता को जगाने के लिए ही किया जाता है।

लेकिन धीरे-धीरे कालांतर में ऊपर की चीजें तो रह गईं, पर अंदर का भाव क्षीण हो गया। जैसे कुंभ होते थे। यह एक प्रकार से अखिल भारतीय सम्मेलन होते थे, जिनमें धर्म एवं समाज के गहन प्रश्नों पर चर्चा होती थी। सारे समाज की दृष्टि से जो विचार चाहिए, उसको पोषण मिलता था। कालांतर में व्यक्ति यही सोचकर कुंभों में जाने लगे कि इससे मोक्ष मिलेगा। एक डुबकी लगाकर पाप धुल जाएंगे। भारत की एकता की कल्पना ही इसमें से निकल गई। सबकी तीर्थ यात्रा में यहां व्यक्तिगत मोक्ष ही आधार बन गया। यह जो राष्ट्र की एकता की भावना कमज़ोर पड़ गई, उसे नए ढंग से खड़ा करने, सद्भावना को जाग्रत् करके हिंदू के नाते अपना यह संस्कार का कार्य चलता है। यह एक व्यवस्था निर्माण करने, अनुशासन लाने का कार्य है, क्योंकि यदि कहे गए सारे गुण रहे और यह व्यवस्था और अनुशासन न रहा तो फिर यह गुण छोटे-छोटे समूहों के। लिए ही रह जाएंगे। कुछ नए आधार देकर इस भावना को पुष्ट कर सकें, इसके लिए ही संघ का निर्माण हुआ है।

एक और विचार भी आता है कि राष्ट्र का विचार तो किया गया, लेकिन मानवमात्र का विचार तो किया ही नहीं। मैं तो इतना ही कहूंगा कि हम इस पर सत्य के आधार पर विचार करेंगे। यह जो मानव है-यह अनेक राष्ट्रों का समूह ही है। यह जो राष्ट्र है, इसकी ऐसी हस्ती है कि लोग चाहे मिट जाएं, पर इसकी हस्ती नहीं मिट सकती। पहले भी नहीं मिट पाई। हम विश्व का विचार राष्ट्र कार्य करते हुए करेंगे, तो आगे बढ़ सकेंगे। राष्ट्र के बिना मानवमात्र का विचार किया तो प्रश्न उत्पन्न होता है कि सब मानवों को बांधनेवाला रस्सा कौन सा है? और तो कोई सूत्र दिखाई नहीं देता। हां, नाक, कान, आंख, टांगें और अन्य इंद्रियां, जैसे बुद्धि एक समान हैं। बाक़ी तो विभेद ही विभेद हैं। भाषाएं अनेक, अच्छे-बुरे की कल्पनाएं अनेक और गुण अनेक हो गए हैं। कई लोगों ने मानव के मोटे-माटे रूप को देखकर ही, मानव समूहों की विशेषताओं को न देखकर केवल नाक, मुंह, इंद्रियों की समानता के आधार पर मानव को एक करने की कोशिश की।
इसलाम और ईसाइयत ने यहां तक कहा कि सब मानव एक हैं और फिर कुछ मोटे-मोटे उसूल रख दिए।

परंतु हमने देखा कि यह सब चल नहीं पाया। इन्हें राष्ट्रीयता की चट्टान से टक्कर लगी और ये चूर-चूर हो गए। अनेक राष्ट्र ऐसे हैं, जो क्रिश्चियन हैं, लेकिन वे भी आपस में लड़े। ईसाइयत के आधार पर लड़ाई टाली नहीं जा सकी। उसके फेल होने का कारण क्या, तो उसने सबको Flat बनाने की कोशिश की। इंग्लैंड ने पहले रोम से संबंध तोड़ा, फिर अपना अलग चर्च स्थापित किया। पश्चिम में गिरजाघर में लोग साप्ताहिक एकत्र होते हैं। वह भी इसलिए कि वह पारस्परिक संपर्को के लिए एक अच्छा स्थान है। उनका एक और उपयोग अवश्य बाक़ी रह गया है कि अपने राष्ट्र के स्वार्थ के लिए हथियार बनाकर पादरियों द्वारा अन्य देशों को क़ाबू में करने के लिए, इन्हें अपने प्रभुत्व में लाने के लिए, जो भी ईसाई मिशनरी जिस देश में जाता है, वह दूसरे देश में जाकर ईसाइयत का प्रचार नहीं करता, वह तो अपने देश की सभ्यता का प्रचार करता है।

गोवा हमारे देश में है। लेकिन वहां का रहन-सहन, दैनिक जीवन, मकान आदि देखने से पता चलता है कि पुर्तगाल के किसी हिस्से में हम घूम रहे हैं। पांडिचेरी में फ्रांस का तथा बाक़ी हिस्से में जहां ईसाइयों ने धर्म-परिवर्तन किया, अंग्रेज़ी सभ्यता का ही बोलबाला है। वास्तव में मिशनों की स्थापना से विभिन्न देशों द्वारा अपने प्रभाव को बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इसलाम के साथ भी ऐसा ही हुआ। अपने ही देश में जो पाकिस्तान नाम का देश बना, वह इसलाम के नाम पर लोगों को भड़काकर स्थापित किया गया, परंतु वही पाकिस्तान अफगानिस्तान से दुश्मनी लेता है। ईरान में क्या हुआ? रजा शाह पहलवी ने अपनी पहलवी भाषा को स्थान दिया। अरबी भाषा को एकदम हटा दिया और यह सब राष्ट्र के अभिमान के कारण ही हुआ। टर्की जो कि इसलाम का केंद्र माना जाता था, वहां पर भी जब राष्ट्रवाद प्रबल हुआ तो कमाल पाशा ने स्वयं खलीफा को, जिसके प्रथम महायुद्ध के पश्चात् हटाए जाने पर सारे इसलाम जगत् में हाहाकार मच गया था। भारत में तो मुसलमानों को सहायता देकर ख़िलाफ़त आंदोलन भी खड़ा हुआ था, एकदम हटा दिया। अरबी भाषा को देश निकाला देकर तुर्की भाषा की प्रतिष्ठा की, यहां तक कि अपना नाम भी कमाल अली से कमाल पाशा कर दिया।

वास्तव में जहां राष्ट्र भाव दुर्बल था, वहां इसलाम फैल गया, ईसाइयत फैल गई। लेकिन जहां यह भाव मजबूत रहा, वहां यह नहीं जम पाया। इस तथ्य को उर्दू के प्रसिद्ध कवि इकबाल ने अपनी कविता में स्वीकार किया। जहां जितनी राष्ट्रीयता दुर्बल थी, वहां उतना नुक़सान हुआ।

इसी प्रकार का एक प्रयास कम्युनिज्म करना चाहता है। वह भी दुनिया भर के लोगों को एक करना चाहता है। उसकी भी यदि टक्कर आ रही है तो राष्ट्रीयता से। कम्युनिज्म का मंत्र सृष्टा मार्क्स माना जाता है। उसने भविष्यवाणी की थी कि जहां औद्योगिक उन्नति बढ़ती जाएगी, वहां धन की विषमता बढ़ने के कारण से पहले क्रांति होगी और मजदूरों को राज्य स्थापित होगा। यूरोप में औद्योगिक क्रांति सबसे अधिक इंग्लैंड में हुई, परंतु वहां कम्युनिज्म का नामोनिशान नहीं, फिर इस आधार पर क्रांति हुई कहां? तो रूस में जो औद्योगिक दृष्टि से सबसे पिछड़ा हुआ था, वहां भी यह कब संभव हुआ, जब वहां राष्ट्रीयता निचले स्तर पर पहुंच चुकी थी, रूस जर्मनी से हार खा चुका था। फ़ौजें निराश थीं, देश आत्मविश्वास खो चुका था। तब लेनिन क्रांति करने में सफल हुआ और वह भी कैसर के हाथ में कठपुतली बनकर। यानी जैसे सूर्य डूबता है।

तो कीड़े निकलकर आते हैं। सूर्य निकला तो कीड़े भाग खड़े होते हैं, वैसे ही राष्ट्रीयता जागी तो ही टीटो टक्कर लेने के लिए खड़ा हो गया। आज हम देखते हैं कि कम्युनिज्म की स्थिति शायद उतनी प्रबल और स्थिर नहीं, जितनी आज से दस वर्ष पूर्व थी। इसका एक ही निष्कर्ष निकलता है कि कम्युनिज्म भी मानव को एक करने की बजाय रूस का साम्राज्य बढ़ाने का साधन मात्र बनकर रह गया है।

हम यदि मानव की एकता ला सकते है तो इस प्रकार निर्मित समूहों की विशेषताओं को साथ लेकर चलने से। तभी मानव की कुछ सेवा हो सकती है। दुनिया का कोई भी महापुरुष शून्य में बैठकर विचार नहीं करता। उसकी अपनी परिस्थितियां होती है-इर्दगिर्द रहनेवाले विशेष प्रकृति के लोग होते हैं। उनके अनुसार उसके कार्य की रूपरेखा बनती है, लेकिन यदि मार्क्स ने जिस परिस्थिति में जन्म लेकर उसके संबंध की विचारधारा खड़ी की, इस क्षेत्र के अतिरिक्त यदि उसने कहा कि सारी दुनिया को इस प्रकार बनाना होगा तो वास्तव में वह अपनी चीज़ लादना चाहता है। जहां इतनी अनेकता, विभिन्नता उत्पन्न हो चुकी है, वहां उन सब विशेषताओं को ख़त्म करके चलना संभव नहीं। चाहिए तो यह कि प्रत्येक समूह अपनी-अपनी विशेषताएं लेकर खड़ा हो और विचार करे कि दुनिया को हम यह योगदान करेंगे। हमें जो स्वर मिले हैं, उन्हीं के द्वारा सुंदर गा सकेंगे। इसी के आधार पर हम विचार करें, सोचें कि किस प्रकार अपनी संस्कृति को अपनाकर संसार को कुछ विशेषता दे सकते हैं।

पहले हिंदुस्तान के बारे में सोचें, बाद में जो कुछ ज्ञान हमारे पास है, वह दुनिया को दें। दुनिया को अच्छा लगे, तो ग्रहण करे। यह हमारा कोई आग्रह नहीं, ज़ोर जबरदस्ती नहीं। अपनी बात कह दी है। अच्छी लगे तो ले लो। आज तो वैसे भी संसार ऐसी आवश्यकता का अनुभव कर रहा है। हमारे पास एक श्रेष्ठ समाज रचना है, व्यवस्था है, उसको ठीक प्रकार से उतारने के लिए जो आधारभूत संस्कार चाहिए, वे अपनाएं। उन्हें जीवन में लाकर हम कुछ प्रत्यक्ष व्यवस्था खड़ी कर सकें और संसार की कुछ सेवा कर सकें, बस इतना ही अपने कार्य का रूप है। परमात्मा से प्रार्थना है कि वह हमें इसको पूरा करने की सामर्थ्य दे।