राष्ट्र के वैभव में व्यक्ति का वैभव


     (12 जून, 1959 को संघ शिक्षा वर्ग, दिल्ली में दिए गए बौद्धिक का प्रथम भाग)

 

दीनदयाल उपाध्याय

 

जिन संस्कारों के परिणामस्वरूप सामूहिक भावनाओं की सृष्टि राष्ट्र में होती है, उन संस्कारों को समुच्चय भाववाचक जो नाम मिला है-वह संस्कृति है। उस राष्ट्र की जो अपनी विशेषताएं होती हैं, उनके आधार पर ही उस राष्ट्र में सामूहिक भावना की सृष्टि होती है। इसी संस्कृति की विभिन्नता के कारण प्रत्येक राष्ट्र के जीवन के व्यवहारों, आदर्शो, आचार, धर्म और ऐसी ही अन्य अनेक बातों का अंतर दिखाई देता है। जहां तक अपने देश का संबंध है, हमारी जो कुछ मूलभूत विशेषता है, उसके आधार पर हम व्यक्ति-व्यक्ति के बीच के संबंध किसी स्वार्थ के सहारे स्थापित नहीं करते। हम किसी व्यक्ति के साथ भलाई इसलिए नहीं करते कि कल वह भी हमारे साथ भलाई करेगा। हम दस लोग इसलिए एकत्र नहीं खड़े कि दसों की स्वार्थ-सिद्धि होगी। यह तो व्यापारिक कल्पना है। यह कल्पना तो चोर, लुटेरों, डाकुओं में भी आ सकती है। वे भी अपना आचार-धर्म निर्माण कर सकते हैं। अपने में अनुशासन भी ला सकते हैं।

हिंदू ने आपसी संबंधों को इस नाते से नहीं देखा। हमारे यहां सामूहिक जीवन की कल्पना व्यक्ति-व्यक्ति के स्वार्थ की पूर्ति के लिए नहीं की। यह तो कोई भी समझ सकता है कि राष्ट्र के वैभव में व्यक्ति का वैभव छिपा है, किंतु हमने अपनी संस्कृति के आधार पर निस्वार्थ वृत्ति को ही अपने संबंधों का कारण बनाया है। मैं समाज के लिए काम करूंगा। उसमें जो कुछ प्राप्ति होगी, वही मेरा प्राप्तव्य होगा।’ बस इसी में सुख का अनुभव होगा। यह हमारा आदर्श है। हमारी राष्ट्रीयता की कल्पना कोई Selfishness extended विस्तारित स्वार्थपरता नहीं है। इसलिए हमने प्रतिज्ञा में भी यह शब्द प्रयोग किया कि हम अपनी संस्कृति, अपने धर्म तथा समाज का संरक्षण करना चाहते हैं। लेशमात्र भी स्वार्थ नहीं रखते। हम स्वार्थ के लिए भी तो समाज का काम कर सकते हैं और यह सभी प्रकार के कामों में हो सकता है।

व्यक्ति विचार कर सकता है कि मैं कुछ काम करूंगा, इससे सामर्थ्य बढ़ेगी, वैभव आएगा तो मुझे भी उसका हिस्सा मिलेगा, लेकिन हमने निश्चय किया है कि हम सब कार्य निस्वार्थ बुद्धि से करेंगे। यदि इस प्रकार निस्स्वार्थ बुद्धि से हम कार्य करेंगे तो इसके जो संस्कार हम पर पड़ेंगे, तो वे अपनी संस्कृति के अनुकूल ही होंगे। मानो कोई किसी स्वार्थ से प्रेरित होकर संघ की शाखा में आता है तो उस पर योग्य संस्कार नहीं पड़ेंगे। बाह्य रूप से बेशक कुछ परिवर्तन दिखाई दे, लेकिन आंतरिक रूप से उसमें कोई परिवर्तन नहीं आएगा। जैसे व्यक्तिगत रूप में स्वार्थ के आधार पर संबंध स्थापित हो सकते हैं, उसी प्रकार स्वार्थ के आधार पर हम शायद राष्ट्रीयता का जागरण कर लें, लेकिन हम उससे हिंदू राष्ट्र का जीवन खड़ा हुआ, नहीं कहेंगे। कुछ करोड़ लोग इकट्ठे हो गए हैं, उन्होंने कुछ वैभव भी प्राप्त कर लिया, लेकिन उसमें शायद आनंद प्राप्त नहीं होगा। इसलिए हमारे यहां सारा व्यवहार, विचार निस्स्वार्थ भाव के आधार पर ही किया गया है।

हम स्वयंसेवक अपनी संघशाखा में आते हैं। प्रश्न उत्पन्न होगा कि एक स्वयंसेवक दूसरे से कैसा व्यवहार करे? इसपर थोड़ा सा विचार करें तो जो गुण इस दृष्टि से चाहिए, वे हिंदू संस्कृति के संस्कार-स्वरूप ही होंगे। स्वयंसेवकों के बीच में पहली बात देखते हैं तो प्रेम का संबंध रहता है, वह भी निस्स्वार्थ भाव से रहता है। निरहेतुक होता है, केवल हिंदू होने के नाते। मान लो, कहीं कोई स्वयंसेवक दूर सफर पर चला आता है। गाड़ी में उसे एक और स्वयंसेवक उसी स्थान का मिल जाता है। उससे मिलकर जो भाव पैदा होता है, जो आकर्षण पैदा होता है, जरा सोचिए, क्या उसके पीछे कोई स्वार्थ छिपा रहता है। यह बात अलग है कि उस स्वयंसेवक के कारण उसे कहीं ठहरने की सुविधा प्राप्त हो जाती है, लेकिन किसी स्वयंसेवक के मन में यह बात नहीं आती। यदि किसी के मन में ऐसा आ गया तो समझो कि उसके मन का स्वयंसेवक गया। किसी को हम शाखा में लाते हैं। क्यों लाते हैं? क्या इसलिए लाते हैं कि कल को अपने को भी नौकर की जरूरत पड़ गई तो ठीक रहेगा। ऐसी बात नहीं है।

वह तो केवल हिंदू के नाते से आता है। उसके साथ जो स्वाभाविक प्रेम है, आत्मीयता है, उसे देखकर ही आता है। जब वह इस दृष्टि से देखता है तो वे सब बातें पैदा होने लगती हैं, जो अपनी संस्कृति की देन हैं।

प्रेम के साथ ही फिर सहिष्णुता पैदा होगी। कई लोग सहिष्णुता का अर्थ समझते हैं। कि कोई व्यक्ति जो कुछ कहता, करता रहता है, उसे सहन कर लेना सहिष्णुता है। जिसे अंग्रेजी में टॉलरेंस कहते हैं। यह टॉलरेंस मात्र है। सहिष्णुता इससे दो क़दम आगे है। टॉलरेंस में एक पराएपन का, दूरी का भाव रहता है। जैसे गाड़ी में कोई बच्चा शरारत करता है, किसी की चीजें इधर-उधर करता है या अन्य प्रकार की गड़बड़ी करता है तो हम सोचते हैं कि चलो, ठीक है। बच्चा है, कर लेने दो। कमजोरी के कारण भी यह भाव उत्पन्न होता है। अब क्या करें, लड़ें क्या? ऐसा भाव रहता है।

सहिष्णुता के पीछे ऐसी कोई कमज़ोरी का भाव नहीं है और न ही कोई पराएपन का भाव है। उल्टे, यहां तो अपनेपन के कारण दूसरे की बात के प्रति ध्यान देना; उसमें भी कुछ ठीक हो सकता है, उस पर विचार करें। एक और इच्छा भी छिपी कि जो उसमें कुछ बुरा है, उसे कैसे दूर किया जाए, इस प्रकार उसकी कमियों के प्रति प्रेमपूर्ण उपचार करने की दृष्टि रखना, इतना ही है। टॉलरेंस से तो कुछ लोग कह सकते हैं कि अपने सत्य पर विश्वास ही नहीं रहता। वास्तव में कई उसे बहुत दूर तक ले भी गए। मेरा भी कहना ठीक हो सकता है, दूसरों का कहना भी ठीक हो सकता है, लेकिन इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति सोचता है कि अंतिम सत्य कितना कठिन है। जैसे किसी ने अंग्रेजों के यहां किसी से पूछा कि वह व्यक्ति अंदर है क्या? तो उत्तर देने वाला कहेगा, “मुझे लगता है कि वह वहां नहीं है और यदि वह आदमी वहां नहीं हुआ, तो वह उत्तर देने वाला कहेगा, मुझे डर है कि वह वहां नहीं है, अब वह विश्वास के साथ कहता है कि वह है या नहीं है। यह जो मुझे है और डर वाली भाषा है, क्या यह प्रकट नहीं करती कि अपने प्रति अविश्वास है। हो सकता है, मेरा कहना गलत हो, लेकिन हमारे यहां यह श्रद्धा कि उसके अंदर यह सच्चाई हो सकती है। परंतु उसके साथ ही प्रेम से उसके अंदर की कमी को सुधारने का भाव भी छिपा हुआ है।

उदाहरण ही लेना हो तो घर में एक छोटे से बच्चे का लें। मान लो वह अपनी तोतली भाषा में मांगता है, समझ में आता नहीं तो क्या करते? गाली देते? नहीं, उसकी भाषा के पीछे उसका मतलब क्या है, यह टटोलते। मुझे एक बच्चे की बात याद आई। वह कहता था, अटू-अटू। लोगों को समझ में नहीं आ रहा था। उन्होंने उसे लड्डू दिया, उसने नहीं लिया। फिर सोचा शायद यह सत्तू मांगता हो। वह भी उसने नहीं लिया। वास्तव में वह लट्टू मांग रहा था। लटू मिलने पर वह खुश हो गया। पश्चिम की टॉलरेंस तो कहेगी कि इसे चिल्लाने दो, इसको बोलने का अधिकार है, इसे बोलने दो। वाल्टेयर ने इस दृष्टि से कहा है कि यद्यपि तुम्हारे कहने पर मुझे विश्वास नहीं, पर तुम्हारे बोलने के अधिकार के लिए मैं आख़िरी दम तक लडूंगा, लेकिन हम इससे भी आगे गए हैं। दूसरों में भी सच्चाई ढूंढ़कर उस सच्चाई को अपनी सच्चाई के साथ समन्वय का प्रयास हम करते हैं। यह सहिष्णुता हमारी संस्कृति का प्रमुख गुण है।

कोई नया स्वयंसेवक जब शाखा में आता है तो वह यहां का विचार सुनने के पश्चात् कई बार हमारे विचार को संकुचित कहता है, कभी सांप्रदायिक बताता है, परंतु हम उसकी सब बातों को बड़े आराम से सुनते हैं। इसलिए नहीं कि हममें टॉलरेंस का भाव है। न ही हम उसे यह कहते कि यदि तुम ऐसा सोचते हो तो कल से मत आना। उसके ख़िलाफ़ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात भी नहीं सोचते। तो क्या करते हैं, उसकी बात को सुन लेते हैं और बाद में समझाने का प्रयत्न करते हैं। उसे एक पक्का हिंदू राष्ट्रवादी और निष्ठावान स्वयंसेवक बनाकर छोड़ते हैं। हमारी संस्कृति का यह जो प्रमुख गुण है, शाखा में काम करते हुए जब इस प्रकार का प्रेम जाग्रत् होता है तो सेवावृत्ति भी जागती है।

जब किसी स्वयंसेवक के जीवन में कोई कठिनाई उत्पन्न हो जाती है, वह बीमार हो जाता है अथवा अन्य कोई कष्ट आ पड़ता है, तब हम उसकी सहायता, सेवा एवं दवा-दारू करते हैं। इसलिए नहीं कि कल हमें भी कोई कष्ट या रोग घेर सकता है। इतना नहीं तो जो स्वयंसेवक बीमार या कष्ट में होता है, वह इसकी अपेक्षा भी नहीं करता। वह सोचता है कि उस वक्त में इन स्वयंसेवकों को मेरी देखभाल छोड़कर कुछ नए स्वयंसेवक बनाने चाहिए, अपना काम नहीं छोड़ना चाहिए। तब ज्यादा अच्छा होगा। इस प्रकार दोनों ओर कार्य के अनुरूप व्यवहार होने लगता है।

एक बार एक स्वयंसेवक को मुझे मालूम है कि वह बीमार पड़ गया। उसकी ख़बरगिरी के लिए स्वयंसेवक गए तो सही, पर ज्यादा नहीं। एक बार मैं घूमते हुए उधर जा निकला तो वह भी मिला। बड़ा नाराज सा था। कहने लगा कि मैंने इतना काम किया, संघ को इतना समय देता रहा, अपने घर-बार को छोड़ा। यह भाव उसके मन में आ गया। इसे क्या कहेंगे? तो इसे हम मानव की कमजोरी कहकर टाल सकते हैं। पर हिंदू संस्कृति का यह आधार नहीं। हमने आपसी संबंधों की दृष्टि से ऐसा अपेक्षा का भाव कभी निर्माण नहीं किया। क्रमश: