सही शब्द : सही अर्थ-1


दीनदयाल उपाध्याय

समाज, संस्कृति, धर्म और राष्ट्र-ये चारों ही ऐसे शब्द हैं, जिनके साथ जीवन का घनिष्ठ संबंध होते हुए भी उनके बारे में देश में बहुत भ्रम फैला हुआ है। इसका बहुत बड़ा कारण यह भी है कि जब हम इन शब्दों का कोई पर्याय विदेशी भाषाओं में ढूंढ़ने का प्रयास करते हैं तो वहां उन तथाकथित पर्यायवाची शब्दों के पीछे जो भाव उन भाषाओं में खड़े किए गए हैं, उन्हें अपने देश में भी आरोपित करने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार ये शब्द आज हमारे लिए कष्टप्रद और मतिभ्रम उत्पन्न करने वाले बन गए हैं।

राष्ट्र

सर्वप्रथम राष्ट्र शब्द की ही आजकल हमारे यहां प्रादेशिक राष्ट्रवाद की कल्पना प्रचलित हो गई है। लोग कहते हैं, जो भी यहां पैदा हो गया है- फिर उसके विचार चाहे जैसे हों-वही इस राष्ट्र का अंग माना जाना चाहिए। उदाहरणार्थ, एक सज्जन मुझे संसद में एंग्लो इंडियन सदस्य श्री फ्रैंक एंथोनी द्वारा प्रस्तुत अंग्रेजी विषयक प्रस्ताव की वकालत करते हुए समझाने लगे कि एंग्लो इंडियन भी तो भारत के राष्ट्रीय हैं। अतः जिस भाषा को मातृभाषा के रूप में बोलते हैं, उसे क्यों नहीं हमें अपने संविधान में स्थान देना चाहिए? मैंने उनके उत्तर में केवल इतना ही कहा, “राष्ट्रीय हैं या राष्ट्रीय होना चाहिए-इन दोनों बातों में बहुत अंतर है। यह तो मैं मानता हूं कि जो लोग इस रूप में जन्म लेते हैं, उन्हें राष्ट्रीय बनने के लिए प्रयास करना चाहिए, किंतु इस बारे में मतभेद हो सकता है कि वे जैसे कुछ आज बने हुए हैं, उसी रूप में पूर्ण राष्ट्रीय हैं अथवा नहीं।’’ मैंने उनसे कहा, “आज तो वे अंग्रेजी को अपनी मातृभाषा मानते हैं और आप कहते हो कि वे राष्ट्रीय हैं, अतः उनकी मांग मान लेनी चाहिए। पर यदि अपने देश में रहनेवाले कुछ रोमन कैथोलिक लोगों ने रोम के पोप को, जिसे वे केवल अपना धर्मगुरु ही नहीं तो सब प्रकार से जीवन का केंद्र मानकर चलते हैं, भारत के राष्ट्रपुरुषों की श्रेणी में रखने की मांग की तो? और इसी सिद्धांत का सहारा लेकर यदि कुछ लोग अपनी देशबाह्य निष्ठा (Extra-Territorial loyalty) के कारण किसी विदेशी राज्य का हस्तक बनकर हमारे देश में खड़े हो गए तो आप उन्हें क्या कहेंगे?” इस प्रकार राष्ट्रीयता के मूल तत्त्वों के बारे में आज हमारे यहां बहुत भ्रम है, जिनकी स्पष्ट व्याख्या होना राष्ट्र हित में नितांत आवश्यक है।

धर्म

दूसरा शब्द धर्म भी इसी प्रकार भ्रम में फंसा हुआ है। धर्म को उपासना पद्धति के साथ बैठाकर लोग मुसलमान धर्म के समान ही हिंदू धर्म शब्द का भी प्रयोग करते हैं। यह शब्द प्रयोग ठीक नहीं, क्योंकि हिंदू धर्म के अंतर्गत जो अनेक भाव आते हैं, वे केवल पूजा-पद्धति तक ही सीमित नहीं हैं। बहुधा ‘धर्म’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय ‘रिलीजन’ शब्द को माना जाता है। किंतु इस एक छोटी सी भूल के कारण धर्म शब्द का मूल अभिप्राय लोप हो जाता है और उस पर रिलीजन’ शब्द के भाव आरोपित हो जाते हैं। इसके कारण ही आज हमारे राष्ट्र जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएं पैदा हो गई हैं।

समाज

उसी प्रकार यह समाज क्या है? समाज शब्द से क्या अभिप्राय निकलता है? जिसको हम हिंदू समाज कहते हैं, वह कहां से आया, कैसे बना? उसका विकास कैसे और कब प्रारंभ हुआ? इन सब बातों का कोई विचार न कर हम समाज शब्द का अंग्रेज़ी में अनुवाद ‘सोसायटी’ शब्द से करते हैं और एक क्षण के लिए भी यह विचार नहीं करते कि इन दोनों शब्दों की उत्पत्ति, विकास और मूल भावनाओं में कितना मौलिक अंतर है।

संस्कृति और भ्रामक कल्पना

अंतिम शब्द है संस्कृति । इसके संबंध में सबसे अधिक भ्रम फैला हुआ है। वह भ्रम यहां तक फैल गया है कि आजकल संस्कृति माने नाचना-गाना, सिनेमा-थियेटर अथवा इसी प्रकार के मनोरंजन के कार्यक्रम। आजकल सांस्कृतिक शिष्टमंडलों के नाम से जो दल विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार करने के लिए भेजे जाते हैं, उनमें केवल नाचना-गाना जानने वाले कलाकार ही होते हैं; कई बार तो यह भी आवश्यक नहीं माना जाता कि वे भारतीय संगीत अथवा नृत्य को जानते ही हों। क्या यही भारतीय संस्कृति है, जिसका प्रचार करने हेतु एक समय भारत के संत और महर्षि दुर्लक्ष्य हिमालय को लांघकर एशिया के दूर देशों में गए थे? जिसका प्रचार करने के लिए स्वामी विवेकानंद एकाकी ही अमरीका पहुंच गए थे? आज तो ऐसा लगता है मानो प्रत्येक सिने तारिका विदेशों में जाकर स्वामी विवेकानंद के महान् मिशन की पूर्ति की अधिकारिणी बन बैठी है। यह सब क्यों हो रहा है? केवल इसलिए कि संस्कृति के बारे में हमारी कल्पनाएं स्पष्ट नहीं हैं।

संस्कृति और राष्ट्र

अत: हम विचार करें कि संस्कृति क्या है। यह विचार इसलिए भी करना आवश्यक है, क्योंकि संस्कृति साधारणतया किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है और कोई भी राष्ट्र तभी तक जीवित माना जा सकता है, जब तक उसकी आत्मा उसके भीतर विद्यमान है। केवल बाह्य उपकरणों से राष्ट्र जीवित नहीं रहता। राष्ट्र में रहनेवाले मनुष्य आते-जाते रहते हैं, उनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती है। राष्ट्र की भूमि भी उन मनुष्यों के सामर्थ्य के अनुसार कभी उनके पास रहती है, कभी दूसरों के अधिकार में चली जाती है। इन दोनों के घट-बढ़ से राष्ट्र के अस्तित्व पर प्रभाव नहीं पड़ता, किंतु यदि एक बार ये दोनों बने रहे, पर ‘संस्कृति’ समाप्त हो गई तो राष्ट्र जीवन का अंत समझना चाहिए। जिस प्रकार आत्मा निकल जाने के पश्चात् अत्यंत हट्टा-कट्टा शरीर भी किसी अर्थ का नहीं रहता, उसी प्रकार संस्कृति के समाप्त होने के बाद अन्य तत्त्व शेष नहीं रहें तो भी राष्ट्र नष्ट हो जाता है।

राष्ट्र कब मरते हैं?

आजकल लोग कहते हैं कि यूनान का पुराना राष्ट्र समाप्त हो गया। क्या समाप्त हो गया? यूनान की भूमि जहां की तहां मौजूद है, आज भी नक्शे में उसे देख सकते हैं। वहां लोग भी रहते हैं। वे कोई ऐसे नहीं कि किसी भूकंप में पुराने सब लोगों के यकायक समाप्त हो जाने के उपरांत फिर नए सिरे से किसी दूसरी जगह से लेकर बसाए गए हों। वास्तविकता यह है कि उन्हीं पुराने लोगों की संतान आज भी वहां रहती हैं। किंतु पुरानी संस्कृति समाप्त हो गई, पुराने लोगों की जीवन-प्रणाली नष्ट हो गई। अत: हम कहते हैं कि यूनान का पुराना राष्ट्र मर गया। इसी प्रकार मिस्र मिट गया रोम का अस्तित्व नहीं बचा। अर्थात् संस्कृति इतना महत्त्वपूर्ण तत्त्व है कि उसके नष्ट होने के संपूर्ण राष्ट्र जीवन का प्रवाह खंडित हो जाता है। अतः उसके मूल रूप का विचार करना अत्यंत आवश्यक है।

संस्कृति शब्द की उत्पत्ति

वैसे संस्कृति शब्द थोड़ा नया है अर्थात् अपने पुराने संस्कृत वाङ्मय में यह शब्द नहीं मिलता। कितना नया होते हुए भी वह कम ही प्रचलित है और हिंदुस्तान में लगभग सभी भाषाओं में एकाध को छोड़ दिया जाए तो इस शब्द का प्रयोग प्रचलित है। संस्कृति शब्द नया होते हुए भी वह शब्द जिसमें इसका घनिष्ठ संबंध है, बहुत पुराना है। वह शब्द है संस्कार। सभी इससे परिचित हैं और थोड़ा भी व्याकरण की दृष्टि से विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कारों को जो भाव और परिणाम है, वही संस्कृति है। मलयालम भाषा में तो संस्कृति शब्द है ही नहीं। उसके स्थान पर संस्कार शब्द का ही प्रयोग होता है। संस्कारों का जीवन पर जो प्रभाव पड़ता है, उनकी मन पर जो अमिट छाप पड़ती है, उसी का समावेश संस्कृति शब्द में होता है।

संस्कार

संस्कार अच्छे भी होते हैं और बुरे भी। जो कर्म हम करते हैं और उनका जो परिणाम होता है, उसे ही हम संस्कार कहते हैं। दूसरे के कर्म का हमारे मन पर जो परिणाम होता है, उसे भी संस्कार कहते हैं। साधारणतया संस्कार शब्द में हम बुरे संस्कारों को नहीं गिनते। उन्हें अलग से कुसंस्कार कहकर पुकारते हैं। चरित्रवान और रूपवान के समान ही जब हम किसी व्यक्ति को संस्कारी कहते हैं, तो उसका अर्थ यही है कि वह अच्छे संस्कारों वाला व्यक्ति है। उसी प्रकार अच्छे संस्कारों के परिणाम और भाव को ही हम संस्कृति कहते हैं। व्यक्ति में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के संस्कार एवं गुण हैं। वह अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कर्म करता है। इनके कारण उसके चरित्र के अच्छा और बुरा दोनों पहलू होते हैं। इस संपूर्ण चरित्र, कर्म और संस्कारों का समुच्चय वाचक यानी उसका व्यक्तित्व होता है। व्यक्तित्व में अच्छे और बुरे दोनों आ गया, इस पूर्ण व्यक्तित्व में से बुरे को अलग करके जो अच्छा शेष रहता है, उसको शील नाम से अभिप्रेत करते हैं। इन शीलयुक्त संस्कारों का परिणाम ही संस्कृति कहलाता है।

अच्छे-बुरे की कसौटी

किंतु अब प्रश्न उठता है कि अच्छा क्या और बुरा क्या? देखने पर लगता है कि अलग-अलग मानदंड हैं। इनकी भिन्नता के कारण ही एक देश और दूसरे देश की संस्कृति में अंतर आ जाता है। इसी भिन्नता के परिणामस्वरूप इन राष्ट्रों के छोटे से लेकर बड़े व्यवहार में भी भेद मालूम पड़ने लगता है। उदाहरण के लिए हम अपने यहां नमस्कार करते हैं, किंतु अंग्रेज़ किसी संस्कारी भारतीय महिला को नमस्कार करने के लिए हाथ आगे बढ़ाए तो कैसा लगेगा? इन छोटी-छोटी चीजों को लेकर वहां के राष्ट्र-जीवन की अच्छाई-बुराई का पता चलता है। हमारे प्रधानमंत्री वैसे तो हिंदू संस्कृति पर कतई विश्वास नहीं करते, किंतु इस देश की मिट्टी में जन्म लेने के कारण उनके मन पर कुछ संस्कार तो हैं ही। पिछले दिनों उनकी अमरीका यात्रा के दौरान उन्हें अमरीका में एक भोज दिया गया। उसके भोज में अमरीका के लगभग सभी धनी-मानी लोग एकत्र थे। एक पत्रकार भी वहां उपस्थित था। पत्रकारों की आदत के अनुसार उसने वहां पर उपस्थित सभी धनिकों की माली हैसियत को जोड़कर हिसाब लगाना प्रारंभ किया और नेहरूजी से बोला, इस समय आप इतने करोड़ डॉलरों के मध्य बैठे हैं। पंडित नेहरू को यकायक यह समझ में नहीं आया, इतने करोड़ डॉलरों के बीच बैठने का क्या मतलब है? बाद में पत्रकार ने जब स्पष्टीकरण किया तो नेहरूजी को उसकी बात बड़ी विचित्र लगी। उन्हें अटपटा लगा कि इस व्यक्ति ने उस सारे भोजन का मापन किया तो केवल डॉलरों में। उन्होंने हंसते हुए कहा, “हमारे देश में मापने का यह मापदंड नहीं है। देखने की हमारी दृष्टि दूसरी है। हमने अपने जीवन के आदर्श भिन्न रखे गए हैं।’’ इसी दृष्टि भेद की ओर संकेत करते हुए ही स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि इंग्लैंड प्रत्येक चीज को पाउंड, शिलिंग, पेंस में बताता है तो भारत प्रत्येक बात को धर्म की भाषा में बोलता है। एक देश में कालानुसार अच्छे-बुरे की कल्पनाओं का अंतर होता रहता है। अतः किसी काल-विशेष में अच्छे-बुरे की कसौटी यही हो सकती है कि जो अपने जीवन-ध्येय की ओर बढ़ाने में साधक हो, वह अच्छा और जो अपने ध्येय के लिए असाधक हो, वह बुरा। छोटी से छोटी बातों के बारे में निर्णय देते समय भी मनुष्य को अपने ध्येय को ध्यान में रखना पड़ता है।

जीवन-ध्येय क्या?

अतः अब विचार करना पड़ेगा कि अपना ध्येय क्या जिसके अनुसार हम अच्छे-बुरे का निर्णय करें। भिन्न-भिन्न देशों की जीवन पद्धति में जो भिन्नता दिखाई देती है वह क्यों? क्या यह परिस्थिति वश अकस्मात् हो गई अथवा उसके पीछे जीवन की कोई ध्येयोन्मुखी प्रक्रिया है? जो ईश्वर-विश्वासी हैं, वे यह मान सकते हैं, ईश्वर की सृष्टि उसका योजनाबद्ध प्रयास है। उसने जो कुछ भी बनाया है, वह एक-दूसरे के पूरक के नाते बनाया है। यदि कोई ईश्वर को न माने तो प्रकृति में भी यह दिखता है कि यह एक ऐसा चक्र है, जहां सब एक-दूसरे के पूरक हैं। एक प्रकार से यहां सब लोगों के कार्य (Function) एक-दूसरे के पूरक हैं। इस प्रकार प्रत्येक राष्ट्र की प्रकृति, विशिष्टता और जीवन-दृष्टि तथा ध्येय भगवान् की योजनानुसार ही निश्चित हुआ होगा। हमारे समाज शास्त्र में यह स्वीकार किया गया है कि पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाला प्रत्येक राष्ट्र, प्रत्येक जाति समुह अपने जीवन में कुछ विशेषताएं लेकर उत्पन्न हुआ है। हम यह नहीं मानते कि बंदर से आगे जाकर मनुष्य बना। न ही हम यह मानते हैं, स्वर्ग में आदम हौवा नामक स्त्री-पुरुष के जोड़े से मानव जाति उत्पन्न हुई। हम लोग तो यह मानकर चलते हैं। कि सृष्टि के आदिकाल एवं बाद में भी जातियां पैदा होती रही हैं। इसका यह भी अर्थ नहीं कि वह करोड़ों लाखों में पैदा हों। यदि एक-दो व्यक्ति पैदा हो गए तो वही एक जाति का प्रतिनिधित्व और विकास करते हैं।

‘चिति’

ये जातियां भगवान की ओर से कुछ निश्चित ध्येय ‘Mission’ लेकर आती हैं। उसी के साथ भगवान ने शेष सृष्टि भी एक-दूसरे का पूरक करके उत्पन्न की। दांत दिए तो अन्न भी उपजाया, दांत नहीं तो दूध पैदा किया। बटेर पैदा की तो उसके खाने के लिए कीड़े पैदा किए। सांप पैदा हुआ तो उसकी क्षुधा निवृत्ति के लिए मेढ़क भी भेजे। सब एक-दूसरे के पूरक हैं। पता नहीं भगवान का जो यह चक्र चला, उसके साथ क्या योजना है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वह योजना विद्यमान है। यदि सब में कवि की प्रतिभा हो तो , संसार का क्या होगा? यदि सब नाचनेवाले ही हो जाएं तो क्या दृश्य पैदा होगा? कहने का अर्थ यह है कि गुणों और प्रतिभाओं का विभाजन किया और उन्हें एक-दूसरे का पूरक बनाया। इसी प्रकार जातियों के बारे में है। जाति का सही पर्याय कास्ट नहीं है। प्रत्येक जाति भगवान् के पास से कुछ विशेषता लेकर आती है। वह विशिष्ट भावना उस जाति के प्रत्येक मनुष्य में अल्पाधिक मात्रा में विद्यमान रहती है, जो नए लोग उसमें समाविष्ट होते हैं, उन्हें भी दया-धर्म के अनुसार मिलती है और उसी जातिगत वैशिष्ट्य या भावना को अपने यहां एक तकनीकी नाम ‘चिति’ दिया गया है। यही राष्ट्र की मूल भावना है, जो राष्ट्र के प्रत्येक घटक में सामान्य तत्त्व (Common factor) के रूप में रहती है। यह जीवन की एक दृष्टि है। इसी दृष्टि के आधार पर जीवन के सुख की कल्पना की गई है। यदि इस दृष्टि के अनुसार सुख मिला तो जीवन सफल, अन्यथा नहीं।

जीवन-दृष्टि की विभिन्नता के कारण ही प्रत्येक राष्ट्र की सुख की कल्पना भिन्न है। मूलतः कौन सी प्रकृति यह भगवान के यहां से लेकर आया है, इसी पर उसके सुख का महल खड़ा होता है। इस मूल प्रकृति को चिति कहते हैं। यही राष्ट्र का केंद्रबिंदु (Nucleus) है। शेष सब तत्त्व इसके लिए पूरक होते हैं। इसके आधार पर जिन-जिन संस्कारों की सृष्टि होती है, उन सबसे एवं उन संस्कारों से बनने वाले भाव को मिलाकर हम संस्कृति कहते हैं। अर्थात् यह चिति ही परम सुख की कल्पना का आधार है। इस चिति की अनुभूति के लिए ही मनुष्य सब कार्य करता है। संस्कृति एक गतिमान (Dynamic) कल्पना है, यह वर्द्धमान है, व्यापक है तो चिति स्थायी होती है। वह भगवान् केंद्रबिंदु Nucleus के रूप में जितनी प्राप्त होती है, उतनी ही रहती है। वह हम को दया-धर्म के अनुसार मिलती है, चिति के मूल ध्येय की प्राप्ति के लिए जो हम संस्कार डालते हैं, उन संस्कारों का भावात्मक रूप ही संस्कृति कहलाता है। यह वर्द्धमान है, गतिशील है।
              (-पाञ्चजन्य, जुलाई 6, 1959)