राष्ट्र का अर्थ


दीनदयाल उपाध्याय

राष्ट्रीयता क्या है? इसका विचार करने की बात उठे, यह किसी भी देश के लिए अत्यंत दुर्भाग्य की वस्तु है, फिर भी आज इसका विचार करना पड़ रहा है, क्योंकि अपने देश में लोगों को इसके संबंध में पर्याप्त भ्रम है।
हम कौन है? क्या हैं? इसका लोगों को पता नहीं। राष्ट्र क्या है? इसके संबंध में लोगों में इतना भ्रम है कि जो राष्ट्र है, उसे वे ठुकरा देते हैं और जो राष्ट्र नहीं है, उसे पकड़कर पोषण करने का प्रयास करते हैं। किंतु यह स्वाभाविक है कि गलत चीज के पोषण से सही चीज मिलती नहीं। कोयल अपना अंडा कौवे के घोंसले में रख देती है, कौवा उसे अपना अंडा समझकर सेता रहता है, पर अंत में उसमें से निकलती कोयल ही है, कौवा नहीं। इसकी प्रकार गलत चीज को राष्ट्र में सेवन करने से राष्ट्रीयता नहीं, कुछ और ही वस्तु निकलेगी।
हमने पिछले चालीस वर्षों में यह देखा कि राष्ट्रीयता के लिए बलिदान दिए गए, त्याग किए गए, उनमें राष्ट्रीयता की ही भावना थी। उनके बलिदान के पीछे जो एक समर्पण की भावना, सर्वस्व निछावर की प्रवृत्ति चाहिए, उसमें भी किसी प्रकार की कमी नहीं थी। गुरुता भी उनकी कम नहीं की जा सकती। परंतु आज हमें उनसे मिला क्या? क्या आज भारत में राष्ट्रीयता बलवती है? हमारी सरकार को आज स्वतंत्र भारत में इस बात की कमेटी बिठानी पड़ती है कि राष्ट्रीयता को कैसे बढ़ाया जाए। इसका विचार करना पड़ता है, क्योंकि आज वह नहीं है।
चालीस वर्षों के इन प्रयासों में से जो चीजें पैदा हुई हैं, वे हैं भाषा विवाद, सांप्रदायिकता, देश-विभाजन, व्यक्ति-स्वार्थ व सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार। चालीस वर्षों के राष्ट्रीय जागरण का यह परिणाम है। ऐसा क्यों हुआ? एक अच्छा काम करते हुए ये बुराइयां क्यों आईं? इसका कारण यह है कि चाहे हमारी भावना अच्छी रही हो, संकल्प अच्छा हो, किंतु दिशा ग़लत थी। हमने हीरा निकालना चाहा, किंतु कोयले की खानों को खोदा। कितनी भी इच्छा और परिश्रम महान् क्यों न हो, गलत काम से हीरा नहीं निकलेगा, क्योंकि गलत प्रकार से प्रयत्न किया गया।
आज भी यही स्थिति है। चालीस वर्षों के परिश्रम और अनुभव के बाद भी लोग सही बात समझना नहीं चाहते, गलत बात पर ही डटे हुए हैं। कुछ उसका व्यामोह हो गया है। व्यामोहवश गलत बात से ही चिपक गए हैं और उसे छोड़ नहीं पाते हैं, जिस प्रकार कोई प्राणी किसी जाल में फंसने पर उसमें से निकलने का प्रयत्न करने पर उसमें और भी उलझ जाता है। अत: मोह न रखकर जाल को ही काट देना चाहिए। यह मोह बहुत हो गया है।
इस स्थिति में हमें यह विचार करना है कि राष्ट्र क्या है? हमारी राष्ट्रीयता क्या है? हमें किस प्रकार के प्रयत्न करने पड़ेंगे तथा किस प्रकार की सावधानियां रखनी पड़ेंगी। इन सब बातों का हमें गंभीरता से मूलभूत रूप से विचार करना है। रेखागणित में और न्याय में कुछ बातों को स्वयं सिद्ध तथ्य (एक्सीमेटिक ट्रुथ) कहते हैं। जैसे मैं मनुष्य हूं, यह स्वयंसिद्ध तथ्य है। इसे सिद्ध करना बड़ा कठिन है। किंतु जब मनुष्य अपनेपन को भूल जाए, अपने को मनुष्य समझे ही नहीं तो उसे यह बताना पड़ता है कि तुम मनुष्य हो। वह भावात्मक रूप से नहीं समझता, तो अभावात्मक रूप से समझता है।
भारत की राष्ट्रीयता का निर्णय करने के लिए एक कमेटी बिठाई गई। उसमें विचार होने लगा कि राष्ट्रीयता क्या है? वे कहने लगे कि हम तो एक राष्ट्र हैं ही नहीं; हमें राष्ट्र बनाना है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसमें विश्वास नहीं करता। उस कमेटी में एक स्वयंसेवक भी था। उसने कहा कि हम एक राष्ट्र हैं, हमें राष्ट्र को बनाना नहीं है, उसे पहचानना है। किंतु उस समय इसे नहीं माना गया। पर जब चीन का आक्रमण हुआ तो राष्ट्र के लोग एक होकर धन देने, सेना में भरती होने, चीन का सामना करने खड़े हो गए। इसके बाद फिर जब कमेटी के लोग मिले तो कहा कि अब इस कमेटी की आवश्यकता ही नहीं रही; हम राष्ट्र हैं, यह तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
तात्पर्य यह कि चीन के आक्रमण के विरोध से यह पता लगा कि हम एक राष्ट्र हैं। कभी-कभी बहुत सी चीजों का पता विरोध से लगता है। जिसे स्वयं अपनी असलियत का पता नहीं, उसे दूसरे बताते हैं। चीन के आक्रमण से जो प्रतिक्रिया देश में हुई, उससे हमें भूली हुई राष्ट्र-भावना का पता चला। पता तभी चलता है, जब दूसरे लोग बताते हैं। जब झगड़ा होता है या दूसरे लोग इसका विरोध करते हैं, तभी हम समझते हैं कि संघ में इतनी ताकत है।
प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में एक कहानी है कि हम आत्मा को किस प्रकार भूल जाते हैं। दस मनुष्य एक साथ यात्रा करने चले। मार्ग में एक नदी पड़ी। नदी को पार कर दूसरे किनारे पहुंचने पर एक-दूसरे को गिनने लगे कि कहीं कोई नदी में ही तो नहीं रह गया। हर एक गिननेवाला अपने को छोड़कर शेष नौ को गिन लेता और इस प्रकार नौ ही गिनने में आते। सबके गिनने के बाद उनको यह लगा कि हम में से एक नदी में डूब गया। यह सोचने पर वे बैठकर रोने लगे। इतने में एक घुसड़वार आया और उनसे पूछा कि क्या बात है? उन्होंने बताया कि हम दस व्यक्ति आए थे, उनमें से एक नदी में डूब गया है। घुड़सवार ने देखा कि ये तो पूरे दस ही दिखाई देते हैं तो उसने पूछा कि कौन डूब गया है? इस पर उन्होंने बताया कि न जाने कौन डूब गया है, पर हम नौ ही रह गए हैं। घुड़सवार ने पूछा कि नौ कैसे रह गए? उनमें से एक ने गिनकर बताया कि 1-2-3-4-5-6-7-8-9! उसने अपने को गिना नहीं और कहा कि हम नौ ही रह गए हैं। घुड़सवार समझ गया कि ये मूर्ख हैं। बोला, ‘मैं दसों को निकाल दूं।’ उन्होंने कहा, ‘हम आपके कृतज्ञ होंगे।’ घुड़सवार एक-एक को चाबुक लगाता गया और गिनता गया। अंत में दसवीं चाबुक लगाकर कहा, ‘दस हो गए न?’
इस ‘दशमो अयं’ की कहानी की तरह हम भी अपने को भूल जाते हैं और चाबुक लगानेवाले को धन्यवाद देते हैं। इसीलिए नेताओं ने कहा कि चीन को धन्यवाद है कि उसने चाबुक लगाया, जिससे हमें पता लग गया है कि हम सब एक हैं। चाबुक लगने पर राष्ट्रीयता का विचार हो तब तो उस घोड़े जैसी स्थिति हो जाएगी, जो चाबुक लगने पर ही ठीक प्रकार से चलता है। पर भगवान् चाबुक मारनेवाले भेजें, उसके कारण हम में राष्ट्रीयता आए, यह बात ठीक नहीं। हमें तो इस राष्ट्रीयता की भावना को स्वाभाविक दृष्टि से पुष्ट करना पड़ेगा। हमें इसे भावात्मक दृष्टि से देखना चाहिए और कोई हम पर चाबुक उठाए या टेढ़ी नजर से देखे, ऐसा मौका ही नहीं आने देना चाहिए।
अब हम इस सामान्य सी चीज का राष्ट्रीयता के संबंध में तार्किक दृष्टि से विचार करें। सबसे पहले ‘राष्ट्र’ का अर्थ व भाव क्या है? सामान्य पद-व्याख्या की दृष्टि से यह एक समुच्चय-वाचक-संज्ञा (Collective Noun) है। राष्ट्र मनुष्यों का वह समूह है, जो एक देश में रहता है। अर्थात् एक देश और मनुष्य-समूह मिलकर राष्ट्र बनता है, इतनी सी बात तो सामान्य लोगों की समझ में भी आ जाती है। किंतु एक बात भूल जाते हैं कि देश का स्वरूप कौन सा है, उसका प्रकटीकरण कैसे होता है।
(क्रमश:)