सिद्धांत और नीतियां : पं. दीनदयाल उपाध्याय

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जनवरी, 1965 में  विजयवाड़ा में जनसंघ के बारहवें सार्वदेशिक अधिवेशन में स्वीकृत दस्तावेज

(गतांक से…)

राज्य-आवश्यकता

कृत युग में जब मानव परस्पर धर्म के आधार पर एक-दूसरे की रक्षा करते थे, राज्य नहीं था। किंतु वह एक आदर्श स्थिति है और तभी संभव है, जब प्रत्येक व्यक्ति पूर्णतः द्वंद्वातीत, निस्स्वार्थ, निस्पृही एवं धर्मनिष्ठ हो। सामान्यतः समाज में सुव्यवस्था बनाए रखने तथा प्रत्येक घटक को धर्मपालन को सुविधा देने के लिए राज्य एक आवश्यक संस्था है।

आदर्श राज्य-धर्मराज्य

भारतीय राज्य का आदर्श ‘धर्मराज्य’ रहा है। यह एक असांप्रदायिक राज्य है। सभी पंथों और उपासना पद्धतियों के प्रति सहिष्णुता एवं समादर का भाव भारतीय राज्य का आवश्यक गुण है। अपनी श्रद्धा और अंतःकरण की प्रवृत्ति के अनुसार प्रत्येक नागरिक का उपासना का अधिकार अक्षुण्ण हैं तथा राज्य के संचालन अथवा नीति निर्देशन में किसी भी व्यक्ति के साथ मत या संप्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं हो सकता। धर्मराज्य थियोक्रेसी अथवा मजहबी राज्य नहीं है।

‘धर्मराज्य’ किसी व्यक्ति अथवा संस्था को सर्वसत्तासंपन्न नहीं मानता। सभी नियमों और कर्तव्यों से बंधे हुए हैं। कार्यपालिका, विधायिका और जनता सबके अधिकार धर्माधीन हैं। स्वैराचरण कहीं भी अनुमत नहीं। अंग्रेजी का ‘Rule of Law’ (विधि के अनुसार शासन) धर्मराज्य की कल्पना को व्यक्त करनेवाला निकटतम शब्द है। निरंकुश और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों को रोकने तथा लोकतंत्र को स्वच्छंदता में विकृत होने से बचाने में धर्मराज्य ही समर्थ है। राज्यों की अन्य कल्पनाएं अधिकारमूलक हैं, किंतु धर्मराज्य कर्तव्य-प्रधान है। फलत: इसमें अपने अधिकारों के हनन की आशंका असीम अधिकार प्राप्ति की लालसा, सीमित अधिकारों से असंतोष, अधिकारारूद होने पर कर्तव्यों की उपेक्षा अधिकारमद, विभिन्न अधिकारों के बीच संघर्ष इन सबके लिए कोई गुंजाइश नहीं है।

कर्तव्य और अधिकार

‘धर्मराज्य’ में जनाधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। जनता का इन मूलभूत अधिकारों के प्रति जागरूक रहना कर्तव्य है। बिना इसके धर्मपालन संभव नहीं। ‘अधिकार’ वह उपादान है, जिससे व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करने में सक्षम होकर अपने स्वतंत्र अस्तित्व की तथा एक बड़ी सत्ता के अंगभूत होने की अनुभूति करता है। कर्तव्य और अधिकार उस त्रिकोण की दो भुजाएं हैं, धर्म जिसका आधार है। सैनिक का अधिकार है कि उसे शस्त्र मिले, बिना उसके वह रक्षा के अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर सकता। शस्त्र की उपलब्धि और प्रयोग कब और कैसे हो, इसका नियमन धर्म से होता है।

लोकतंत्र

लोकाधिकार की प्रतिष्ठा और लोक-कर्तव्य के निर्वाह का लोकतंत्र एक साधन है। केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं, अपितु आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में भी लोकतंत्र चाहिए। वास्तव में जनतंत्र अविभाज्य है। किसी भी एक क्षेत्र में लोकतंत्र का अभाव एक-दूसरे क्षेत्र में लोकतंत्र को नहीं पनपने देगा। सहिष्णुता, व्यक्ति की प्रतिष्ठा तथा समष्टि के साथ एकात्मकता लोकतंत्र के प्राण हैं। बिना इन भावों के लोकतंत्र का बाहरी स्वरूप निष्प्राण एवं जड़ है। यदि चैतन्य विद्यमान है तो देश-काल-परिस्थिति से लोकतंत्र के रूप में भेद हो सकता है।

अपने प्रतिनिधि चुनने और चुने जाने का अधिकार राजनीतिक लोकतंत्र का प्रमुख लक्षण है। आर्थिक लोकतंत्र के लिए व्यवसाय और उपभोग की स्वतंत्रता आवश्यक है। प्रतिष्ठा एवं अवसर की समानता से सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना होती है। इस बात का प्रयत्न करना होगा कि ये अधिकार एक-दूसरे के पूरक एवं पोषक रहें, विरोधी एवं विनाशक नहीं।

स्वतंत्रता

स्वतंत्रता मानव और राष्ट्र की स्वाभाविक आकांक्षा है। पराधीनता में न तो सुख है, न शांति। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता भी चाहिए। शासन का व्यष्टि और समष्टि के प्राकृतिक हित में हस्तक्षेप न करना तथा सदैव उसके अनुकूल चलना राजनीतिक स्वतंत्रता है। अर्थ के होने अथवा उसके न होने से मनुष्य के हित में विघ्न न होना ही आर्थिक स्वतंत्रता है। समाज का व्यक्ति के स्वाभाविक विकास में बाधक न होकर साधक होना ही सामाजिक स्वतंत्रता है। इन स्वतंत्रताओं के राष्ट्रगत हुए बिना ये व्यक्ति को प्राप्त नहीं हो सकतीं। राज्य के सब अंगों द्वारा अपने-अपने कर्तव्य का पालन करने से सबको स्वतंत्रता प्राप्त होती है।

लोकतंत्र के समान स्वतंत्रता भी अविभाज्य है। बिना शासनिक स्वतंत्रता के अन्य दो स्वतंत्रताएं नहीं हो सकतीं। बिना आर्थिक स्वतंत्रता के मनुष्य को सामाजिक और कुछ अंशों में राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं मिल सकती तथा बिना सामाजिक स्वतंत्रता के अर्थ मनुष्य को भाव और अभाव दोनों रूपों में परतंत्र कर देता है।

अर्थायाम

शासन तंत्र के समान अर्थ-तंत्र में भी अराजकता केवल कृत युग की चीज़ है, अर्थात् अहस्तक्षेप (Laissez faire) का सिद्धांत इसी अवस्था में सर्वहितकारी रूप से चल सकता है, अन्यथा नहीं। अत: अर्थ के उत्पादन, विनिमय एवं उपभोग को व्यवस्थित करने के लिए अर्थायाम आवश्यक है। इस हेतु अर्थ के क्षेत्र में भी अनेक संस्थाओं का जन्म होता है। राज्य का भी इस विषय में महत्त्वपूर्ण दायित्व है। किंतु सभी उद्योगों अथवा उत्पादन के साधनों का राज्य के स्वामित्व तथा प्रबंध के अधीन होना आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के केंद्रीकरण को जन्म देता है। अतः यह ठीक नहीं। पर यह भी स्वीकार करना होगा कि आर्थिक विकास की प्रक्रिया के आरंभ के लिए अर्थव्यवस्था में अनुशासन बनाए रखने के लिए तथा राष्ट्र के आधारभूत लक्ष्यों की सिद्धि के लिए राज्य का कर्तव्य है कि वह आर्थिक क्षेत्र में नियोजन, निर्देशन, नियमन, नियंत्रण का सामान्यतः तथा विशेष क्षेत्रों और स्थितियों में स्वामित्व और प्रबंध का भी दायित्व ले।

अर्थ के अभाव से तो धर्म का ह्रास होता ही है, अर्थ का प्रभाव भी धर्म की हानि करता है। अर्थ के अभाव और प्रभाव दोनों से आर्थिक स्वतंत्रता का हनन होता है। सुसाध्य आजीविका की अप्राप्ति तथा उत्पादन को बनाए रखने अथवा बढ़ाने के लिए आवश्यक पूंजी की कमी अर्थ का अभाव है। यह बात व्यक्ति और राष्ट्र दोनों पर लागू होती है

अर्थ का अभाव और प्रभाव

अर्थ के अभाव से तो धर्म का ह्रास होता ही है, अर्थ का प्रभाव भी धर्म की हानि करता है। अर्थ के अभाव और प्रभाव दोनों से आर्थिक स्वतंत्रता का हनन होता है। सुसाध्य आजीविका की अप्राप्ति तथा उत्पादन को बनाए रखने अथवा बढ़ाने के लिए आवश्यक पूंजी की कमी अर्थ का अभाव है। यह बात व्यक्ति और राष्ट्र दोनों पर लागू होती है। अर्थ की साधनता को भुलाकर उसमें आसक्ति, अर्थ से धर्मानुकूल कामोपभोग की इच्छा का, ज्ञान का और शक्ति का अभाव, अर्थ का अनुचित घमंड, समाज में आर्थिक विषमता, मुद्रा का आधिक्य एवं अवमूल्यन, वे कारण हैं, जिनसे अर्थ का प्रभाव मानव की कर्मशक्ति को कुंठित कर अर्थ और श्री के ह्रास का कारण बनता है।

संपत्ति का स्वामित्व

संपत्ति के स्वामित्व का प्रश्न महत्त्वपूर्ण है। कुछ लोग संपत्ति पर व्यक्ति का निर्बाध अधिकार मानते हैं। दूसरी ओर वे लोग हैं, जो निजी संपत्ति को, विशेषकर उत्पादन के साधनों के निजी स्वामित्व को, सभी बुराइयों की जड़ मानते हैं। ‘ईशावास्यमिदं सर्वं’ के आधार पर कुछ तत्त्व संपूर्ण संपत्ति को ईश्वर की मानकर मनुष्य को विश्वस्त के नाते उसका उपयोग करने का परामर्श देते हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से ‘विश्वस्त’ का विचार अच्छा है, किंतु व्यवहार में ‘विश्वस्त’ को न्याय के किन नियमों और निर्देशों से बांधा जाए और कौन बांधे, यह प्रश्न तो बना ही रहता है।

व्यक्ति या व्यक्तियों का ऐसा समूह, जिसके साथ व्यक्ति जीवन के सभी प्रमुख व्यवहारों तथा आवश्यकताओं के लिए निगडित है, बिना संपत्ति के नहीं रह सकता। कर्म के साथ कर्मफल जुड़ा अर्जित के उपभोग एवं उपयोग की स्वतंत्रता में से संपत्ति पैदा होती है। संपूर्ण आय का उपभोग न कर बचत करना एक स्वाभाविक प्रवृत्ति तथा राष्ट्रीय गुण है। संपत्ति में भी मानव को प्रतिष्ठा, सुरक्षा तथा तुष्टि की अनुभूति होती है। अत: हम संपत्ति को पूरी तरह नहीं मिटा सकते।

संपत्ति का आधार समाज-सापेक्ष है। सब वस्तुओं के लिए एक सी संपत्ति व्यवस्था नहीं है। एक ही वस्तु के लिए सब स्थानों पर और सब समय के लिए एक व्यवस्था नहीं है। यह विभेद समाज की आवश्यकताओं के अनुसार निश्चित हुआ है। जो लोग समाज को संपत्ति का नियंता नहीं मानते, वे केवल इतना चाहते हैं कि समाज विद्यमान मान्यताओं में परिवर्तन न करे। समाज को इस बात का अधिकार है तथा अनेक बार उसका यह कर्तव्य हो जाता है कि वह संपत्ति संबंधी मान्यताओं में परिवर्तन करे। संपत्ति का अबाध एवं अपरिवर्तनीय अधिकार जैसी कोई चीज नहीं है।

संपत्ति का अधिकार हमें मर्यादाओं के अंतर्गत स्वीकार करना होगा। इन सीमाओं का निर्धारण समाज तथा व्यक्ति की आवश्यकताओं एवं जीवन-मूल्यों के आधार पर निश्चित होना चाहिए। जब संपत्ति अपने प्रभाव से स्वामी को आलसी या विलासी और दूसरों को अभावग्रस्त या परतंत्र बनाए तो उसका नियमन आवश्यक है।

संपत्ति संबंधी अधिकारों में परिवर्तन होने पर प्रभावित व्यक्ति के पुनर्वास का दायित्व मूलतः समाज पर आता है। किंतु क्षतिपूर्ति का सिद्धांत नैश्चिंत्य तथा स्थायित्व की दृष्टि से आवश्यक है।

              (क्रमश:…)