सिद्धांत और नीतियां : पं. दीनदयाल उपाध्याय

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प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करे, उसे सुदृढ एवं स्थायी बनाने का प्रयत्न करे तथा अपने नागरिकों को एक ऐसा शासन प्रदान करे, जिसके अंतर्गत वे अपने जीवन की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हुए समृद्ध, सोद्देश्य एवं सुखी समाज के संगठन में सचेष्ट रह सकें। भारत की स्वतंत्रता के उपरांत जन-मन में यह सहज आकांक्षा जाग्रत् हुई थी और यह अपेक्षा की गई थी कि सदियों से परतंत्र अतः संघर्षरत राष्ट्र अब अपने स्वाभाविक स्वरूप एवं प्रतिष्ठा को प्राप्त कर अपने घर का नव-निर्माण कर सकेगा, रूढ़ियां समाप्त होकर स्वस्थ चैतन्यमयी संस्थाएं जन्म लेंगी तथा आर्थिक दुर्व्यवस्था एवं सामाजिक अन्याय के पार्टी में पिसनेवाला जनजीवन संपन्नता और समानता के वातावरण में संतोष की सांस ले सकेगा। बड़े-बड़े उद्घोषों और योजनाओं के बावजूद जनता की अपेक्षाएं पूर्ण नहीं हुई। उल्टे अव्यवस्था और अनाचार, अभाव और असमानताएं, असुरक्षा और असामाजिकता पहले से अधिक तीव्र और व्यापक हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद स्वातंत्र्य के प्रथम उद्रेक में देशी राज्यों के विलीनीकरण, संविधान के निर्माण तथा अर्थव्यवस्था के औद्योगीकरण एवं अभिनवीकरण की दिशा में अवश्य उल्लेखनीय कदम उठाए गए, किंतु वह आवेश शीघ्र ही समाप्त हो गया। यहां तक कि परिवर्तन से उत्पन्न स्वाभाविक समस्याओं के समाधान एवं सामंजस्य के प्रयत्नों के स्थान पर हम उनसे अभिभूत हैं। राष्ट्र को सुनिश्चित और सुनियोजित दिशा में आगे बढ़ने के स्थान पर शासक और शासित विभ्रम और विरक्ति के शिकार बनकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो धारा में बहते हुए से दिखाई देते हैं। अनास्था और आत्मविश्वासहीनता की यह अवस्था राष्ट्र के अस्तित्व और अस्मिता के लिए संकटपूर्ण एवं अशोभनीय है। इसे बदलकर देश के पुरुषार्थ को सचेत करना होगा।

वर्तमान दुरवस्था का कारण

वर्तमान परिस्थिति का सबसे प्रमुख कारण राष्ट्र जीवन की आत्मा का साक्षात्कार न करते हुए उसके ऊपर विदेशी और विजातीय विचारधाराओं एवं जीवनमूल्यों को थोपने का प्रयत्न है। शीघ्र उन्नति की आतुरता में दूसरे देशों का अंधानुकरण करने और ‘स्व’ के तिरस्कार की प्रवृत्ति पैदा हुई है। इससे राष्ट्रमानस में कुंठा घर कर गई है।

जनसंघ-एक ऐतिहासिक आवश्यकता

विश्व का ज्ञान हमारी थाती है। मानवजाति का अनुभव हमारी संपत्ति है। विज्ञान किसी देश-विशेष की बपौती नहीं। वह हमारे भी अभ्युदय का साधन बनेगा। किंतु भारत हमारी रंगभूमि है। भारत की कोटि-कोटि जनता पात्र ही नहीं प्रेक्षक भी है, जिसके रंजन एवं आत्मसुख के लिए हमें सभी भूमिकाओं का निर्धारण करना है। विश्व-प्रगति के हम केवल दृष्टा ही नहीं, साधक भी हैं। अतः जहां एक ओर हमारी दृष्टि विश्व की उपलब्धियों पर हो, वहीं दूसरी ओर हम अपने राष्ट्र की मूल प्रकृति, प्रतिभा एवं प्रवृत्ति को पहचानकर अपनी परंपरा और परिस्थिति के अनुरूप भविष्य के विकास क्रम का निर्धारण करने की अनिवार्यता को भी न भूलें। ‘स्व’ के साक्षात्कार के बिना न तो स्वतंत्रता सार्थक हो सकती है और न वह कर्मचेतना ही जागत् हो सकती है। जिसमें परावलंबन और पराभूति का भाव होकर स्वाधीनता, स्वेच्छा और स्वानुभवजनित सुख हो। अज्ञान, अभाव तथा अन्याय की परिसमाप्ति और सुदृढ़, समृद्ध, सुसंस्कृत एवं सुखी राष्ट्र जीवन का शुभारंभ सबके द्वारा स्वेच्छा से किए जानेवाले कठोर श्रम तथा सहयोग पर निर्भर है। यह महान् कार्य राष्ट्र जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक नए नेतृत्व की अपेक्षा रखता है। भारतीय जनसंघ का जन्म इसी अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए हुआ है।

उद्देश्य

भारतीय जनसंघ का उद्देश्य भारत को उसकी संस्कृति और मर्यादा के आधार पर एक राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जनतंत्र बनाना है, जिसमें व्यक्ति को समान अवसर और स्वतंत्रता प्राप्त हो तथा जो भारत को सुदृढ़ एवं सुसंपन्न बनाते हुए उसे एक प्रगतिशील, आधुनिक और जागरूक राष्ट्र बनाए, जो दूसरों के आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना कर सके और विश्व शांति के स्थापनार्थ राष्ट्र संघ में समुचित रीति से प्रभाव डाल सके।

भारतीय सांस्कृतिक अधिष्ठान की अपरिहार्यता

लोकतंत्र, समानता, राष्ट्रीय स्वतंत्रता तथा विश्व शांति परस्पर संबद्ध कल्पनाएं हैं। किंतु पाश्चात्य राजनीति में इनमें कई बार टकराव हुआ है। समाजवाद और विश्व शासन के विचार भी इन समस्याओं के समाधान के प्रयत्न से उत्पन्न हुए हैं, पर वे कुछ नहीं कर पाए।

उलटे उन्होंने मूल को धक्का लगाया है और नई समस्याएं पैदा की हैं। भारत का सांस्कृतिक चिंतन यह तात्त्विक अधिष्ठान प्रस्तुत करता है, जिससे उपर्युक्त भावनाएं समन्वित हो वांछनीय लक्ष्यों की सिद्धि कर सकें। इस अधिष्ठान के अभाव में मानव चिंतन और विकास अवरुद्ध हो गया है। भारतीय तात्त्विक सत्यों का ज्ञान, देश और काल से स्वतंत्र है। यह ज्ञान केवल हमारी ही नहीं, वरन् पूर्ण संसार की प्रगति की दिशा निश्चित करेगा।

एकात्मवाद

भारतीय संस्कृति एकात्मवादी है। सृष्टि की विभिन्न सत्ताओं तथा जीवन के विभिन्न अंगों के दृश्य-भेद स्वीकार करते हुए वह उनके अंतर में एकता की खोज कर उनमें समन्वय की स्थापना करती है। परस्पर विरोध और संघर्ष के स्थान पर वह परस्परावलंबन, पूरकता, अनुकूलता और सहयोग के आधार पर सृष्टि की क्रियाओं का विचार करती है। वह एकांगी न होकर सर्वांगीण है। उसका दृष्टिकोण सांप्रदायिक अथवा वर्गवादी न होकर सर्वात्मक एवं सर्वोत्कर्षवादी है। एकात्मकता उसकी धुरी है।
व्यष्टि और समष्टि

व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में चारों का ध्यान रखना होगा। चारों की भूख मिटाए बिना व्यक्ति न तो सुख का अनुभव और न अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है

व्यष्टि और समष्टि के बीच संघर्ष की कल्पना कर दोनों में से किसी एक को प्रमुख एवं संपूर्ण क्रियाओं का अंतिम लक्ष्य मानकर पश्चिम में अनेक विचारधाराओं का जन्म हुआ है। किंतु दृश्य व्यक्ति अदृश्य समष्टि का भी प्रतिनिधित्व करता है। ‘अहं’ के साथ ‘वयं’ की सत्ता भी प्रत्येक ‘अहं’ के द्वारा जीती है। प्रत्येक ‘इकाई’ में समुदाय की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है। व्यक्ति ही समष्टि के उपकरण हैं, उसके ज्ञान-तंतु हैं। व्यक्ति के विनाश या अविकास से समष्टि पंगु हो जाएगी। व्यक्ति ही समष्टि की पूर्णता का माध्यम और माप है। किंतु व्यक्ति की साधना समष्टि की आराधना से भिन्न नहीं हो सकती। शरीर को क्षति पहुंचाकर कोई अंग कैसे सुखी हो सकता है? फूल का अस्तित्व पखुड़ियों की शोभा तथा जीवन की सार्थकता पुष्प के साथ रहकर उसके स्वरूप को बनाने और निखारने में है। व्यक्ति स्वातंत्र्य और समाज हित के बीच कोई विरोध नहीं है।

व्यक्ति का सर्वांगीण विकास

व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में चारों का ध्यान रखना होगा। चारों की भूख मिटाए बिना व्यक्ति न तो सुख का अनुभव और न अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति आवश्यक है। आजीविका के साधन, शांति, ज्ञान एवं तादात्म्य भाव से ये भूखें मिटती हैं। सर्वांगीण विकास की कामना ही व्यक्ति को समाज हित में कार्य की प्रेरणा देती है।

पुरुषार्थ चतुष्ट्य

व्यक्ति के विकास और समाज के हित का संपादन करने के उद्देश्य से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की कल्पना की गई है। धर्म, अर्थ और काम एक-दूसरे के पूरक और पोषक हैं। मनुष्य की प्रेरणा का स्रोत तथा उसके कार्यों का मापक किसी एक को ही मानकर चलना अधूरा होगा। फिर भी धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि का साधन है, अतः आधारभूत है।

धर्म का स्वरूप

कई बार धर्म को मत या मजहब मानकर उसके ग़लत अर्थ लगाए जाते हैं। यह भूल अंग्रेजी के रिलीजन शब्द का ‘धर्म’ से अनुवाद करने के कारण हुई है। धर्म का वास्तविक अर्थ है–वे सनातन नियम, जिनके आधार पर किसी सत्ता की धारणा हो और जिनका पालन कर व्यक्ति अभ्युदय और निःश्रेयस को प्राप्ति कर सके। धर्म के मूल तत्त्व सनातन हैं, किंतु उनका विवरण देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बदलता है। इस संक्रमणशील जगत् में धर्म ही वह तत्त्व है, जो स्थायित्व लाता है। इसलिए धर्म को ही नियंता माना गया है। प्रभुता उसी में निहित है।

राष्ट्र की आत्मा–चिति

समाज केवल व्यक्तियों का समूह अथवा समुच्चय नहीं, अपितु एक जीवंत सावयव सत्ता है। भूमि विशेष के प्रति मातृभाव रखकर चलनेवाले समाज से राष्ट्र बनता है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक विशेष प्रकृति होती है, जो ऐतिहासिक अथवा भौगोलिक कारणों का परिणाम नहीं, अपितु जन्मजात है, इसे ‘चिति’ कहते हैं। राष्ट्रों का उत्थान पतन चिति के अनुकूल अथवा प्रतिकूल व्यवहार पर निर्भर करता है। विभिन्न विशिष्टताओं वाले राष्ट्र परस्पर पूरक होकर मानव एकता का निर्माण कर सकते हैं। राष्ट्रों की प्रकृति मानव एकता की विरोधी नहीं, यदि कहीं उसके विरुद्ध आचरण दिखता है तो वह विकृति का द्योतक है। राष्ट्रों का विनाश कर मानव एकता उसी प्रकार असंभव तथा अवांछनीय है, जिस प्रकार व्यक्तियों को नष्ट कर समष्टि का अस्तित्व या विकास।

चिति की अभिव्यक्ति के उपकरण

समाज को चिति स्वयं को अभिव्यक्त करने तथा व्यक्तियों को विभिन्न पुरुषार्थो के संपादन की सुविधा प्राप्त कराने के लिए अनेक संस्थाओं को जन्म देती है। समाज में इनकी वही स्थिति है, जो शरीर में विभिन्न अंगों की जाति, वर्ण, पंचायत, संप्रदाय, संघ, पूग, विवाह, संपत्ति, राज्य आदि इसी प्रकार की संस्थाएं हैं। राज्य महत्त्वपूर्ण है, किंतु सर्वोपरि नहीं।
(क्रमश:…)