प्रखर राष्ट्रप्रेमी

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डॉ. भीमराव आंबेडकर जयंती (14 अप्रैल) पर विशेष

संजीव कुमार सिन्हा

 

डॉ. भीमराव अंबेडकर का व्यक्तित्व बहुत विराट् था। वे एक विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाज सुधारक तो थे ही, साथ ही प्रखर राष्ट्रप्रेमी भी थे। उनके विचार भारतीयता से ओत–प्रोत थे। वे सामाजिक एकता को राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक मानते थे। बाबा साहब ऐसा समाज चाहते थे जिसमें सामाजिक व आर्थिक असमानता न हो और इसके लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संघर्ष में बिता दिया। उनका नजरिया व्यापक था। दुर्भाग्य से उनके बारे में एक धारणा बना दी गई कि वे केवल वंचितों के मसीहा थे, यह उनके समग्र योगदान को देखते हुए उनके साथ न्याय नहीं है। वे किसी वर्ग विशेष की नहीं परंतु समस्त भारतीय जन की आवाज थे। अखंड भारत और समान नागरिक संहिता का समर्थन, अनुच्छेद 370 का विरोध, देश की राजभाषा संस्कृत हो, आर्य बाहर से नहीं आए थे, धर्म में अटूट विश्वास जैसे उनके अनेक प्रखर विचार यह सिद्ध करते हैं कि उनके राष्ट्र सर्वोपरि था।

राष्ट्रप्रेम : डॉ. अंबेडकर का दृढ़ मत था कि मैं हिंदुस्तान से प्रेम करता हूं। मैं जीऊंगा तो हिंदुस्तान के लिए और मरूंगा तो हिंदुस्तान के लिए। मेरे शरीर का प्रत्येक कण और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के काम आए, इसलिए मेरा जन्म हुआ है। उनके अनुसार, जब तक सामाजिक समरसता का भाव पूर्णत: राष्ट्र में उत्पन्न नहीं होगा तब तक राष्ट्रवाद की स्थापना नहीं हो पाएगी।

डॉ. अंबेडकर का मानना था कि राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग के अंतर को भूलकर उनमें सामाजिक भ्रातृत्व की भावना को सर्वोच्च स्थान दिया जाए। (डॉ. अंबेडकर संपूर्ण वांग्मय, खंड–5)

बाबा साहेब के जीवनी-लेखक स्वर्गीय श्री सी. बी. खैरमोड़े ने उनके शब्दों को उद्धृत किया है, जो राष्ट्रीय दृष्टिकोण का परिचायक है– ‘‘मुझमें और सावरकर में इस प्रश्न पर न केवल सहमति है, बल्कि सहयोग भी है कि हिंदू समाज को एकजुट और संगठित किया जाए, और हिंदुओं को अन्य मजहबों के आक्रमणों से आत्मरक्षा के लिए तैयार किया जाए।’’

9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक में बाबा साहेब ने कहा, ‘‘इस देश का सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक उत्थान आज नहीं तो कल होगा ही, इस बारे में मुझे जरा भी संदेह नहीं है। आज सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक दृिष्ट से हम एक–दूसरे से अलग हो गए हैं, यह मैं जानता हूं, अभी हम एक–दूसरे से लड़ रहे हैं। लड़नेवाली एक छावनी का मैं भी एक नेता हूं। ऐसा हुआ तो भी उचित समय और उचित परिस्थिति आते ही यह विशाल देश एक हुए बिना कभी नहीं रहेगा। दुनिया की कोई भी ताकत उसकी एकता में आड़े नहीं आ सकती। इस देश में इतने पंथ और इतनी जातियां होने के बावजूद किसी न किसी तरह हम सारे लोग इकट्ठा होंगे ही, इस बारे में मेरे मन में जरा भी संशय नहीं है।”

बाबा साहेब ने 1916 में कोलंबिया विश्वविद्यालय में ‘कास्ट इन इंडिया’ प्रबंध प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने लिखा, ‘‘भारत में सर्वव्यापी सांस्कृतिक एकता है। यद्यपि समाज अनगिनत जातियों में बंटा है फिर भी वह एक संस्कृति से बंधा हुआ है।’’

संविधान सभी में 5 फरवरी 1950 को दिया गया उनका भाषण विचारशील है। उन्होंने कहा था, ‘‘भारत शताब्दियों बाद स्वाधीन हुआ है। अब इस स्वराज्य की रक्षा हमारा प्रथम कर्तव्य है। अपने समाज में किसी प्रकार की फूट पुन: हमसे स्वराज्य को छीन लेगी। शताब्दियों की गुलामी के परिणामस्वरूप हमसे कुछ विकृतियां, ऊंच–नीच भेद, आर्थिक विषमता, पिछड़ापन, जातिवाद आदि उत्पन्न हुए हो सकते हैं, परंतु इसे अपना हथियार बनाकर कोई विदेशी हमारे स्वत्वों का अपहरण करना चाहेंगे तो हम उसे सहन नहीं करेंगे। हम उनकी यह आकांक्षा मिट्टी में मिला देंगे। यह हमारा घरेलू मामला है, इसलिए हम इससे आपस में निबटेंगे। अपने लाभ मात्र या सामाजिक दृष्टि से अवनत स्थिति से निकलने की इच्छा से हम किसी विदेशी के हस्तक नहीं बनेंगे। हमें अपने में उत्पन्न होने वाले जयचंदों से सावधान रहना होगा। अपने जिस राष्ट्र एवं समाज के हम अंग–उपांग है, उसके हित को ठीक प्रकार से पहचानें।’’

अखंड भारत

डॉ. अंबेडकर अखंड भारत के समर्थक थे। उनका मानना था कि हममें इतने जाति–पंथ हैं, तो भी इसमें कोई संदेह नहीं कि हम एक ही समुदाय हैं। भारत के विभाजन के लिए यद्यपि मुसलमानों ने लड़ाई की तो भी आगे कभी एक दिन उन्हें अपनी गलती महसूस होगी और उनको लगेगा एक ‘अखंड भारत’ ही हमारे लिए अच्छा है।

संविधान सभा के प्रथम अधिवेशन में 17 दिसंबर 1946 का वक्तव्य उनके प्रखर राष्ट्रीय व्यक्तित्व का दर्शन कराता है। उन्होंने कहा था, ‘आज मुस्लिम लीग ने भारत का विभाजन करने के लिए आंदोलन छेड़ा है, दंगे-फसाद शुरू किए हैंं, लेकिन भविष्य में एक दिन इसी लीग के कार्यकर्ता और नेता अखंड भारत के हिमायती बनेंगे, यह मेरी श्रद्धा हैं। भारत की अधिकांश सेना में जिन रियासतों ने भारत विरोधी षड्यंत्र करने की पहल की है, अतिरिक्त क्षेत्रीय निष्ठा दिखाई है, उनके दुष्ट प्रयासों का स्वतंत्र भारत के शासकों द्वारा पूरी तरह से कुचलना चाहिए।’’

अनुच्छेद 370 का विरोध

डॉ. अंबेडकर अनुच्छेद 370 को राष्ट्रीय एकता में बाधक मानते थे। उन्होंने इस अनुच्छेद पर संविधान सभा की बहस में विरोध किया था। जब पं. जवाहरलाल नेहरू के सुझाव पर शेख अब्दुल्ला डॉ. अंबेडकर के पास गए तो उन्होंने यह कहकर शेख को उल्टे पांव लौटा दिया, ‘‘आप चाहते हैं कि भारत कश्मीर में सीमाओं की रक्षा करे, सड़कें बनाए, खाद्यान्न की आपूर्ति करे और कश्मीर को भारत के साथ समान दर्जा मिले लेकिन प्रशासनिक क्षेत्र में भारत को न्यूनतम अधिकार हो। ऐसा स्वीकार करना देश के साथ धोखा होगा और एक कानून मंत्री के रूप में मैं ऐसा कदापि नहीं करूंगा।’’

समान नागरिक संहिता का समर्थन

बाबा साहब अंबेडकर संपूर्ण देश के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना चाहते थे। 23 नवंबर 1948 को संविधान सभा में दिए गए भाषण में उन्होंने कहा, ‘‘…मेरे मित्र श्री हुसैन इमाम ने पूछा है कि क्या भारत जैसे विशाल देश के लिए एक समान नागरिक संहिता का होना संभव और वांछनीय होगा? अब मुझे स्वीकार करना होगा कि इस सीधी–सी बात के कारण मुझे घोर आश्चर्य है कि इस देश में मानवीय संबंधों के लगभग हर पक्ष को अपनी सीमा में लिए हुए पहले ही एक समान विधि संहिता है। हमारे पास एक पूरी अपराध संहिता है जो पूरे देश में चलन में है और जो दंड संहिता और क्रीमिनल प्रोसीजर कोड में समाहित है। हमारे पास संपत्ति हस्तांतरण कानून है जो संपत्ति से जुड़े संबंधों का नियमन करता है और जो पूरे देश में चलन में है।… मैं ऐसे असंख्य कानूनों का हवाला दे सकता हूं जो यह साबित करेंगे कि इस देश में व्यावहारिक रूप में एक समान नागरिक संहिता है, जिसकी अंतर्वस्तु समान है और जो पूरे देश में लागू है। केवल एक क्षेत्र ऐसा है जिस पर दीवानी कानूनी अब तक अपनी पकड़ नहीं बना पाया है और वह है विवाह और उत्तराधिकार।’’

इस मुद्दे पर बहस के दौरान कुछ मुस्लिम सदस्यों द्वारा यह आशंका प्रकट करने पर कि समान नागरिक संहिता का प्रावधान मुसलमानों के विरुद्ध है, डॉ. अंबेडकर ने इस आशंका को निर्मूल करार देते हुए कहा था, ‘‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि किसी मुसलमान को कभी भी यह कहने का अवसर नहीं मिलेगा कि समान नागरिक संहिता के निर्माताओं ने मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को भारी आघात पहुंचाया है।’’

भारत की राजभाषा संस्कृत हो

संस्कृत की वैज्ञानिकता को ध्यान में रखकर ही डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में संंस्कृत का समर्थन किया। उन्होंने 10 सितंबर 1949 को डॉ. बी.वी. केसकर और नजीरूद्दीन अहमद के साथ मिलकर संस्कृत को भारतीय संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए संविधान सभा में एक संशोधन प्रस्तुत किया था, परंतु दुर्भाग्यवश वह संशोधन पारित नहीं हो सका। यह सर्वविदित है कि संविधान–सभा में जब राजभाषा को लेकर चर्चा हो रही थी तो डॉ. अंबेडकर व पंडित लक्ष्मीकांत मैत्र ने संस्कृत में धाराप्रवाह वार्तालाप किया।

आर्य बाहर से नहीं आए थे

डॉ. अंबेडकर आर्य आगमन को लेकर विदेशी आक्रमणकारी होने के सिद्धांत को नकारते हैं। उनके शब्दों में, ‘‘आर्यों को विदेशी प्रजाति और भारत पर उनके आक्रमण का सिद्धांत मात्र एक मान्यता और धारणा है, इससे अधिक कुछ भी नहीं।’’ वे अपने विश्लेषण के उपरांत यह लिखते हैं, ‘‘कहना न होगा कि पाश्चात्य लेखकों ने आर्य प्रजाति का जो सिद्धांत दिया है वह हर तरह से धराशायी हो गया है। यह सिद्धांत वैज्ञानिक अनुसंधान का विकृत रूप है। इसे तथ्यों पर आधारित नहीं किया गया। इसके विपरीत यह सिद्धांत पूर्वकल्पित है और तथ्यों का चयन उसे प्रमाणित करने के लिए किया गया है।’’

धार्मिक व्यक्तित्व

डॉ. अंबेडकर धर्म को आवश्यक मानते थे, क्योंकि उनका विश्वास था कि धर्म व अध्यात्म से ही शील पनपता है। मार्क्सवाद धर्महीनता के कारण उन्हें पसंद नहीं आता था। डॉ. अंबेडकर कहते थे, ‘‘मैं धर्म पर विश्वास रखता हूं। धर्म के मूल्यों के बिना समाज का संघर्ष केवल BÊ¿¹ffÊ»fb व सत्तालिप्सु लोगों का एक क्षुद्र संघर्ष बन जाएगा। धर्म आशा देता है, विश्वास देता है, व्यवस्था देता है, अनुशासन देता है।’’ भगवद्गीता के विषय में वे कहते हैं, ‘‘गीता मेरे सत्याग्रह की प्रेरणा का स्रोत है।’’

बौद्ध धर्म अंगीकार

बाबा साहब वंचितों की दयनीय दशा को बदलना चाहते थे। जब उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ने का निश्चय किया तो क्रिश्चियन एवं इस्लामी जगत के नामचीन लोग उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए उनके पीछे पड़ गए। उन्हें ढेरों धन–दौलत का लालच भी दिया गया। तब उन्होंने कहा, ‘‘मैं हिंदू धर्म छोड़ दूंगा, परंतु मैं ऐसे धर्म को अंगीकार करूंगा, जो हिंदुस्तान की धरती पर ही जनमा हो। मुझे ऐसा ही धर्म स्वीकार है, जो विदेशों से आयात किया हुआ नहीं हो। इसी कारण मैं बौद्ध धर्म अंगीकार करता हूं।’’

13 अक्तूबर 1956 को नागपुर में बौद्धमत में दीक्षा लेने से एक दिन पूर्व डॉ. अंबेडकर ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि एक बार उन्होंने गांधीजी को कहा था कि यद्यपि वे उनसे छुआछूत मिटाने के प्रश्न पर मतभेद रखते हैं, पर समय आने पर ‘‘मैं वही मार्ग चुनूंगा जो देश के लिए सबसे कम हानिकर हो। मैं बौद्धमत में दीक्षित होकर देश को सबसे बड़ा लाभ पहुंचा रहा हूं, क्योंकि बौद्धमत भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। मैंने सावधानी बरती है कि मेरे पंथ–परिवर्तन से इस देश की संस्कृति और इतिहास को कोई हानि न पहुंचे।’’ (धनंजय कीर–कृत ‘‘अंबेडकर : जीवन और लक्ष्य’’, पृ. 498)

डॉ. अंबेडकर के कार्यों का संपूर्णता में आंकलन करे तो हम पाएंगे कि वे प्रखर राष्ट्रप्रेमी थे। उनके बारे में समग्रता से निरंतर अध्ययन करने और उनकी राष्ट्रीय दृष्टि को उभारने की आवश्यकता है।