अपनी विचारधारा सहयोग पर आधारित


दीनदयाल उपाध्याय

गतांक का शेष…..

पाश्चात्य जगत में यह मानकर चलते हैं कि इस प्रकार के संघर्ष, इस प्रकार की लड़ाई, इस प्रकार का वर्ग संघर्ष यह उनके सारे विचार की भूमिका है। यह आज की उनकी भूमिका नहीं है, बिल्कुल प्रारंभ की है। ईसाइयों ने स्वयं अपने मत में यही संघर्ष अपने सामने लाकर रखा। एक ओर उन्होंने शैतान और दूसरी ओर ईश्वर को रखा तथा कहा कि दोनों में यह संघर्ष बराबर चल रहा है। उसमें ही उन्होंने यह निश्चित कर दिया कि जिनके पास धन है, संपत्ति है, उत्पादन के साधन हैं, उनको उन्होंने पूंजीपति कहा, इन पूंजीपति और मेहनत करनेवाले मज़दूरों में स्थायी रूप से संघर्ष चल रहा है। श्रमिकों को ही पूर्णतः प्रमुखता देकर पूंजीपतियों को पूर्णतः समाप्त कर देना चाहिए। सारी सत्ता श्रमिकों को अपने हाथ में लेकर चलना चाहिए। फिर उसमें राजनीतिक शक्ति यही विचार प्रमुख है। यही एक विचार अपने सामने लेकर चलते चले जा रहे हैं। यह संघर्ष की भूमिका है। एक-दूसरे के बारे में मूलतः विश्वास न करके दूसरों के साथ अपना संबंध यदि आता है, तो वहां संघर्ष उत्पन्न होता है। यदि दो व्यक्ति मिलते भी हैं तो इसलिए मिलते हैं कि उनके समान स्वार्थ हैं। जहां समान स्वार्थों की भूमिका है, वहां पर दो व्यक्ति मिल सकते हैं। चूंकि सभी पूंजीपति मिल चुके हैं, इसलिए दुनिया के सभी मज़दूर यदि उनका मुक़ाबला करना है तो एक होकर संघर्ष में जुट जाएं। सभी के स्वार्थ एक हैं। समान हितों के लिए मिल जाना चाहिए। यहां एक व्यक्ति का संबंध एक व्यक्ति के बीच केवल स्वार्थ पर ही आधारित है। इसके आगे उसमें कोई विचार करने के लिए तैयार नहीं। यदि राष्ट्र के संबंध में विचार किया तो वहां भी स्वार्थ की ही भूमिका है। राष्ट्र के संबंध में उनकी कल्पनाएं ये हैं कि एक देश में रहनेवाले लोग जिनके समान स्वार्थ हैं, ऐसे लोगों का मिला एक राष्ट्र है, इसके अतिरिक्त कोई विचार नहीं। वे लोग जब मिलते हैं तो वह भी स्वार्थ के आधार पर, जैसे कुछ लोगों को मिलाकर एक joint stock company बनती है। सभी लोग अपने-अपने पैसे देकर शेयर ख़रीदते हैं। शेयर ख़रीदने के बाद उनकी कुछ Liabilities हैं। लिमिटेड कंपनी बनकर एक फर्म बन जाती है। सबके समान स्वार्थ रहते हैं।

Partnership तैयार हो जाती है। उस Partnership में स्वार्थी लोग लाभ की आशा से एकत्र हो जाते हैं, स्वार्थ का ही विचार करके चलते हैं। उसके आगे का विचार करने के लिए तैयार नहीं। यदि राष्ट्र का विचार करेंगे, मानवता का विचार करेंगे तो उसका भी आधार समान हित, समान स्वार्थ है। सब मानवों को मिलकर समान स्वार्थ के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

अभी मैं एक लेख पढ़ रहा था, जिसमें युद्ध की विभीषिका के संबंध में एक विद्वान् व्यक्ति ने अपने विचार व्यक्त किए थे। यदि दस-पांच एटम बम छोड़ दिए गए तो लोगों की संख्या घट जाएगी और जो बच जाएगा, उस पर इतने घातक परिणाम होंगे कि उसको मानव ही कहना कठिन होगा। इस प्रकार कठिन परिस्थिति चली आ रही है। इसलिए अमरीका और रूस को मिल जाना चाहिए। युद्ध बंद कर देना चाहिए। वे आपस में मिलकर क्या करें तो उन्होंने कहा कि थोड़े दिनों में सभी लोग मंगल तथा अन्य ग्रहों पर पहुंच जाएंगे और मंगल ग्रह के मानव बहुत ही सभ्य और विज्ञान की दृष्टि से बहुत विकास कर चुके हैं। अतः संभवतः हमारे वहां पहुंचने पर उनसे संघर्ष करना पड़ेगा। यहां के राष्ट्रों में अब आपस में लड़ाई तो पिछले जमाने की बात हो गई है। यह लड़ाई बंद करके अब पृथ्वी पर रहनेवाले मानवों को मंगल ग्रह पर रहनेवाले मानवों से लड़ना चाहिए।

इस प्रकार शांति से भी उनकी संघर्ष की दृष्टि है। यहां के और वहां के प्राणियों में थोड़ा-बहुत अंतर हो सकता है, परंतु वे हैं एक ही और आपस में मिलकर शक्ति, बुद्धि सबका सहयोग के साथ विकास करेंगे, इसका विचार नहीं। कुछ प्राणिशास्त्रियों का कहना है कि चींटी बहुत ही बुद्धिमान प्राणी है। उसके पास मनुष्य से कम बुद्धि नहीं। यदि उनका आकार मनुष्य से कुछ छोटा रहे, परंतु बुद्धि के साथ-साथ उसमें कुछ शक्ति भी होती तो वह संभवतया मनुष्य पर विजय प्राप्त करके ही रहती। चींटी के पास केवल अभाव है शक्ति का, मनुष्य के पास उसकी तुलना में अधिक शक्ति हो गई। शक्ति अधिक प्राप्त होने के कारण चींटी चींटी ही रहेगी। यदि कहीं ऐसी कल्पना करें कि चींटी को बिल्ली का शरीर मिल जाए तो वह अधिक सशक्त हो जाएगी। तो हम सब मानव मिलकर उनके ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ेंगे। यह भूमिका संघर्ष की भूमिका है। वे इस भूमि को लेकर खड़े हैं। इसके बाद का विचार आएगा कि छोटे से बड़े तक सभी जगह सब संघर्ष की भूमिका है। हर एक अपने-अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अपने-अपने अधिकारों की रक्षा को लेकर चलें।

इसलिए उसमें अधिकार का विचार आता है। पश्चिम में स्वेच्छा से विवाह होने के उपरांत पति और पत्नी के रूप में आने के बाद उनकी कल्पना क्या चलती है? मानो पति पत्नी के अधिकारों को समाप्त करना चाहता है। अतः पत्नी को बराबर सजग रहना चाहिए। इतने होने के बाद पत्नी पति के अधिकारों को छीनने का प्रयत्न करती है। पति और पत्नी में संघर्ष की भूमिका खड़ी होती है। यदि सड़क पर चलते-चलते व्यक्ति किसी मोटर से टकरा जाए, दुर्घटना हो जाए और यह विचार करके चले कि सदैव मनुष्य मोटर से टकराता ही रहेगा। यदि कोई जेबकतरा सड़क पर किसी की जेब कतर ले और सदैव मन में यही भूमिका बनाकर चले कि हमारे आगे-पीछे, दाएं-बाएं जो चल रहे हैं, सभी जेबकतरे होंगे, तो बड़ी मुश्किल होगी। यदि रेल में कभी कोई डाकू आकर लूट ले, ऐसी घटनाएं होती भी हैं, परंतु कोई यह समझने लगे कि जो भी डिब्बे में घुसा, वह डाकू ही होगा। यह धारणा भ्रामक है। पश्चिम का आधार इसी धारणा पर टिका है। वह यह संघर्ष की भूमिका मानकर चलते हैं कि राजा और प्रजा के बीच में एक संघर्ष की स्थिति है। राजा का संघर्ष करना धंधा ही है, वह प्रजा के अधिकार छीनेगा ही। इस प्रकार राजा और प्रजा के बीच संघर्ष रहेगा।

इसी प्रकार यदि देखें, उस मालिक ने, जिसने अनेक कष्ट सहकर संयम रखकर अपना तथा बाप-दादों का पैसा लगाकर एक कारख़ाना खड़ा किया। उधर मज़दूर काम करने के लिए आते हैं, उन्हें भी जीविकोपार्जन करना है। अपने बाल-बच्चों को छोड़कर आते हैं। दोनों मिलते हैं, काम चलता है। दोनों में संघर्ष की भूमिका है। दोनों एक-दूसरे के अधिकार छीनते हैं। दोनों के अलग-अलग हित हैं तो वही संघर्ष खड़ा होता है। वास्तव में दोनों कारखाने में बैठते हैं, दोनों प्रयत्न करते हैं। चीज़ तैयार होती है। दोनों के सामान्य हित हैं। अगर कहीं दोनों के बीच में विरोध भी खड़ा हो गया तो उस विरोध को सामान्य स्थिति मानकर नहीं चलते। वह विरोध विकृति का द्योतक है। वह विकृति है, वह सामान्य स्थिति नहीं। किंतु पश्चिम का जगत् इस स्थिति को सामान्य मानकर चलता है। यह कहते हैं कि वह विरोध है, तो यह विरोध वाली दृष्टि है। हम इसको विरोध नहीं मानते। हम दूसरे प्रकार से विचार करते हैं। हमारी उसकी एक समान हस्ती है, उस आधार पर एकता है। सत्य और शक्ति मेरे अंदर है, वह उसके अंदर भी है। इस आधार पर हम लोगों के बीच में समानता का नाता है। हमने उनको प्रमुखता दी। अतः किसी स्वार्थ के आधार पर विचार नहीं करते कि हमें समान स्वार्थों को लेकर दूसरे राष्ट्रों के साथ संघर्ष करना है।
हमारा दृष्टिकोण पश्चिम के दृष्टिकोण से भिन्न है। जैसे पश्चिम अपना-अपना विचार करके चलते हों और वहां एक कहावत भी बन गई है–Every man for himself and devil takes the hind most. प्रत्येक आदमी अपनी-अपनी फ़िक्र करता है और जो सबके पीछे रह जाएगा तो पिछड़ जाएगा। उसकी चिंता कौन करेगा तो शैतान, मतलब यह कि जो पीछे पिछड़ गया, उसकी उपेक्षा होगी। यह सच्चाई जीवन में नहीं चलती। बल्कि देखेंगे कि जीवन इससे उल्टे आधार पर चलता है।

घर में देखते हैं, परिवार है, यदि परिवार का कोई व्यक्ति बीमार पड़ गया, कुछ काम नहीं कर सका, वह किसी के मतलब का नहीं रहा, अतः उसके लिए भोजन क्यों बनाना? जो परिवार में fittest है, उसे पहले और यदि बचा तो बीमार को बाद में देना। ऐसा होता नहीं। जैसे फैक्टरी में अच्छा माल बना, उसे बिकने के लिए बाज़ार में भेज दिया और जो ख़राब हुआ उसे अस्वीकार कर देते हैं। उसी प्रकार यदि बीमार हो गया तो उसे समुद्र में फेंक दो, ऐसा नहीं होता। होता उलटा है, यदि वह बीमार हो गया तो उसकी ज्यादा चिंता करते हैं। जैसे कि व्यक्ति कमाता है, यदि बाहर से घूमकर आया और मां को बीमार देखकर, सिनेमा जाने का यद्यपि अपने मित्रों से पहले तय करके आया, तो भी उनको लौटा देता है। कहता है कि मेरी मां बीमार है, मुझे उसे दवा देनी है, सेवा करनी है, मैं नहीं जा सकूंगा। पास में यदि पैसा होगा तो डॉक्टर को बुलाएगा, उसकी फ़ीस देगा, दवा देगा। लेकिन यह नहीं कहेगा कि मां पड़ी रहे, मैं तो सिनेमा जाऊंगा। उसकी मुझे क्या चिंता करनी है? ऐसा विचार नहीं करता।

मां का छोटा बच्चा है, वह दिन-रात उसका पालन करती है। तो क्या मां और बेटे दोनों की लड़ाई अधिकारों की लड़ाई है? यदि यह दृष्टि होती तो शायद बेटे का पालन संभव न होता। मां और बेटे के बीच कोई लड़ाई है। यहां पर मां-बाप विवाह करते हैं। परंतु अपने यहां संघर्ष नहीं खड़ा होता। जहां प्रेम होगा, वहां संघर्ष न होगा। हमारी प्रेरणा अधिकारों की नहीं है, अपितु कर्तव्य की है। हम कर्तव्य को आधार लेकर चलते हैं। हम सेवा का विचार करते हैं। अपनी एकात्मता है, उसका अनुभव करते हैं। एकात्मता का अनुभव करने के बाद उसके प्रति सहिष्णुता का विचार करते हैं। हम कर्तव्य का भाव लेकर चलते हैं। सहिष्णुता का भाव लेकर चलते हैं। हमारे यहां तो सहिष्णुता है। उससे आगे बढ़कर विचार करने का है। प्रत्येक के विचार को सुनो, वह जो शब्द कहता है, उसमें भी सच्चाई कितनी है, उसकी सच्चाई को भी सुनना चाहिए। उसको भी समझना चाहिए। इस प्रकार सहिष्णुता का भाव हमारे अंदर आता है, त्याग का भाव आता है। सेवा का भाव जीवन में आता है, एक-दूसरे के प्रति समर्पण का भाव पैदा होता है, सामंजस्य स्थापित होता है।
क्रमश:
-संघ शिक्षा वर्ग, बौद्धिक वर्ग : हरिगढ़ (5 जून, 1962)