आर्थिक लोकतंत्र को मजबूत करेगा सहकार मंत्रालय : विकास आनंद

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भारत के पहले सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने 25 सितंबर को नई दिल्ली में ‘राष्ट्रीय सहकारिता सम्मेलन’ को संबोधित करते हुए कहा कि सहकारिता आंदोलन भारत के ग्रामीण समाज की प्रगति करेगा और एक नई सामाजिक पूंजी की अवधारणा भी खड़ी करेगा। इससे पहले प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सहकारिता को समाजवाद और पूंजीवाद का विकल्प बताया है। ‘अंतरराष्ट्रीय सहकारी गठबंधन’ (आईसीए) सहकारिता को ‘संयुक्त रूप से स्वामित्व वाले और लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रित उद्यम के माध्यम से अपनी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरतों और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए स्वेच्छा से एकजुट व्यक्तियों का एक स्वायत्त संघ’ के रूप में परिभाषित करता है। दूसरे शब्दों में, सहकारिता जीवन के हर क्षेत्र में सामूहिकता की भावना का संचार करती है; चाहे वह सांस्कृतिक क्षेत्र हो, सामाजिक या आर्थिक क्षेत्र हो। निश्चय ही यह आंदोलन सामाजिक पूंजी बनाने के साथ-साथ आर्थिक लोकतंत्र को मजबूत करने में सहायक होगा। ‘सामाजिक पूंजी’ एक साझा मूल्य है जो व्यक्तियों को एक सामान्य उद्देश्य को प्रभावी ढंग से प्राप्त करने के लिए समूह में एक साथ काम करने की प्रेरणा देता है।

सहकारिता को इजरायल के विकास की रीढ़ माना जाता है। इजरायल की भौगोलिक स्थिति और मिट्टी की गुणवत्ता कृषि के लिए उपयुक्त नहीं है। तमाम बाधाओं के बावजूद आज इजराइल कृषि अनुसंधान और विकास और कृषि प्रौद्योगिकी में दुनिया में अग्रणी है। किबुत्ज़ (सहकारिता) के तहत कृषि ने इज़राइल के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

एमाइल दर्खाइम, जॉर्ज सिमेल, वेबर जैसे कई विचारकों का मानना था कि औद्योगीकरण और शहरीकरण सामाजिक संबंधों को अचल रूप से बदल रहे हैं। उन्होंने मूल्यांकन किया कि औद्योगीकरण और शहरीकरण ने सामाजिक बंधन, सहयोग की समृद्ध परंपरा और नैतिक मूल्यों की क्षति पहुचाई है और मानव में अलगाव की भावना पैदा की है। लेकिन यह उल्लेखनीय है कि औद्योगीकरण और शहरीकरण विकासात्मक गतिविधि का एक हिस्सा है। तो ऐसी स्थिति में खामियां कहां हैं? खामियां हैं- उत्पादन के साधन के स्वामित्व को किस प्रकार नियमन करें? प्रमुख रूप से आर्थिक गतिविधियों के दो मॉडल दुनिया भर में प्रचलित हैं। पहला उत्पादन के साधनों पर ‘निजी स्वामित्व’ और दूसरा उत्पादन के साधनों पर ‘राज्य का स्वामित्व’। निजी स्वामित्व ज्यादातर पूंजीवादी व्यवस्था में पाया जाता है और राज्य का स्वामित्व ज्यादातर समाजवादी व्यवस्था में पाया जाता है।

उत्पादन का पूंजीवादी तरीका अपने मुनाफे को अधिकतम करने पर जोर देता है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के तहत आय का असमान वितरण अमीर और गरीब की खाई को गहरा करता है। गरीब और गरीब होता जाता है व अमीर और अमीर होता जाता है। उत्पादन का यह तरीका कुछ लोगों के हाथों में धन के संचय को प्रोत्साहित करता है। कुछ लोगों के हाथ में धन के संचय के कारण आर्थिक लोकतंत्र के विचार को क्षति पहुंचती है। इसके परिणामस्वरूप आर्थिक असंतुलन होता है और उपभोक्ता की क्रयशक्ति कम हो जाती है। यह परिस्थिति राज्य को आर्थिक संकट की ओर ढकेलता है। समाजवादी व्यवस्था उद्यमशीलता के अवसरों को कम करती है और धीमी आर्थिक वृद्धि के लिए जिम्मेदार है। यह हर जगह विफल रही है। इस प्रणाली में एक बड़ी आबादी आर्थिक अवसरों से वंचित होता है। दूसरी ओर, यह लोगों के दिन-प्रतिदिन के जीवन में राज्य के हस्तक्षेप को बढ़ावा देती है और राज्य पर लोगों की निर्भरता बढ़ती जाती है। दोनों ने समाज में साझा मूल्यों और सहयोग की भावना को प्रभावित किया है तथा आर्थिक लोकतंत्र के मूल्यों को भी बाधित किया है, जबकि ‘आर्थिक लोकतंत्र’ सहकारिता की मुख्य विशेषताओं में से एक है।

सहकार, यह साम्यवादी राज्य के विपरीत निजी संपत्ति के उन्मूलन पर नहीं, बल्कि कर्मचारी-नियोक्ता संबंध के परिवर्तन पर जोर देता है, उत्पादकों के स्वयं-प्रबंधन पर जोर देता है और यह स्थानीयता को प्रोत्साहित करता है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भी ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ पर जोर दिया है। सहकारी आंदोलन के लिए अलग मंत्रालय बनाकर मोदी सरकार का उद्देश्य आर्थिक लोकतंत्र को गहरा करने और हाशिए पर रहने वाले वर्ग को आर्थिक रूप से मजबूत करने का है। 30 सितंबर, 2018 को आणंद में अमूल के चॉकलेट प्लांट का उद्घाटन करते हुए श्री मोदी ने कहा कि गुजरात में सहकारी आंदोलन ने समाजवाद और पूंजीवाद का एक सार्थक वैकल्पिक मॉडल प्रदान करता है। सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा लगभग एक सदी पहले सहकारिता के बोए गए बीज तीसरी वैकल्फिक आर्थिक व्यवस्था का उदाहरण बनकर तैयार हुआ है, जहां न सरकार का कब्जा होगा, न धन्ना सेठों का कब्जा होगा; वो सहकारिता आंदोलन होगा और किसानों के, नागरिकों के, जनता-जनार्दन की सहकारिता से अर्थव्यवस्था बनेगी, पनपेगी, बढ़ेगी और हर कोई उसका हिस्सेदार होगा।

गुजरात में सहकारी आंदोलन ने समाजवाद और पूंजीवाद का एक सार्थक वैकल्पिक मॉडल दिया है।
नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री

यह स्पष्ट है कि केंद्र में अलग सहकारिता मंत्रालय बनाकर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने संकेत दिया है कि सहकारिता ही समाजवाद और पूंजीवाद का विकल्प दे सकती है। सहकारी मॉडल में मौजूदा पूंजीवादी मॉडल और समाजवादी दोनों के दोषों को कम करने की क्षमता है। सहकारी मॉडल सामूहिक स्वामित्व के सिद्धांत पर काम करती है। यह सही मायने में आर्थिक लोकतंत्र लाती है। बड़े कॉरपोरेट घरानों के विपरीत, जहां कॉरपोरेट मैनेजर और कॉरपोरेट शेयरधारकों द्वारा निर्णय लिया जाता है, सहकारिता में निर्णय लेने की शक्ति सदस्यों के समूह में होती है जिसमें निर्माता, ग्राहक, आपूर्तिकर्ता और व्यापक जनता शामिल होती है और इसका लाभ सदस्यों के बीच वितरित किया जाता है। अमूल, लिज्जत पापड़, सरस, सुधा डेयरी सहकारिता आंदोलन के प्रतीक हैं, जिन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करोड़ों रोजगार दिए हैं। लिज्जत पापड़ भारतीय महिला कामगारों का सहकार है जो विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण में शामिल है और महिलाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाया है। अमूल और लिज्जत पापड़ अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के रूप में भी उभरे हैं। वे बाजार में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। सहकारी प्रणाली विशेष रूप से कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के फलने-फूलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकते हैं।

ऐसे कई देशों के उदाहरण हैं जहां सहकारिता ने उन्हें दुनिया में अग्रणी बना दिया। सहकारिता को इजरायल के विकास की रीढ़ माना जाता है। इजरायल की भौगोलिक स्थिति और मिट्टी की गुणवत्ता कृषि के लिए उपयुक्त नहीं है। तमाम बाधाओं के बावजूद आज इजराइल कृषि अनुसंधान और विकास और कृषि प्रौद्योगिकी में दुनिया में अग्रणी है। किबुत्ज़ (सहकारिता) के तहत कृषि ने इज़राइल के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अनुसंधान और नवाचार ने देश की फसलों को मात्रात्मक और गुणात्मक रूप से बढ़ाने में शानदार तरीके से भूमिका निभाई है। सहकारी आंदोलन इस देश में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के विकास में चमत्कार सिद्ध हुआ है। इज़राइल में सहकारी को किबुत्ज़ अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता है। ‘किबुत्ज़’ शब्द का अर्थ है इकट्ठा होना। युवा यहूदियों ने पहले कृषि और मानव निवास के उद्देश्य से दलदल और शुष्क भूमि पर बहुत मेहनत की थी, वे अपने लिए एक सामुदायिक संगठन बनाया। जमीन यहूदी राष्ट्रीय कोष बनाकर खरीदी गई। उन्होंने भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए कठोर परिश्रम किया। इन अग्रदूतों ने कृषि पर स्थापित एक समूह का निर्माण किया, जिसे किबुत्ज़ के नाम से जाना जाता था। धीरे-धीरे इजराइल में कृषि क्षेत्र में काम करने के लिए कई किबुत्ज़ अस्तित्व में आए। सहकारिता की भावना ने इज़राइल को कृषि में तकनीकी रूप से बहुत आगे बढ़ाया और दुनिया में कृषि प्रौद्योगिकी में अग्रणी बन गया। 1960 के दशक में केवल 4% इज़राइली किब्बुत्ज़िम में रहते थे। वहीं, आज इज़राइल की संसद में किबुत्ज़निक सदस्यों की संख्या 15 प्रतिशत है।

सहकारिता आंदोलन भारत के ग्रामीण समाज की प्रगति करेगा और एक नई सामाजिक पूंजी की अवधारणा भी खड़ी करेगा।
अमित शाह, केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री

दूसरा उदाहरण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान के विकास का है। युद्ध के बाद के विकास के लिए जापान ने सहकारी दृष्टिकोण अपनाया। युद्ध पूर्व चार प्रमुख कंपनियां जिन्हें सामूहिक रूप से ज़ैबात्सु के नाम से जाना जाता था, का देश की अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में प्रभुत्व था। मित्र देशों की सेनाओं द्वारा जापान की हार के बाद ज़ैबात्सु को भंग कर दिया गया। युद्ध के बाद ज़ैबात्सुओं में शेयरधारिता पैटर्न को बदल दिया गया। परिवारों ने ज़ैबात्सु पर पूर्ण नियंत्रण खो दिया। युद्ध के बाद ज़ैबात्सु का स्वामित्व विभिन्न फर्मों, व्यक्तियों के पास आ गया, लेकिन एक परिवार के पास नहीं था। ज़ैबात्सुओं को पुनर्जीवित करने के इस सहकारी दृष्टिकोण ने जापान के तेज़ आर्थिक विकास में काफी मदद की है। युद्ध के बाद जापान में धन का संकेंद्रण बढ़ने के बजाय गिरा है। जापान के सहकारी दृष्टिकोण को ‘सहकारी पूंजीवाद’ भी कहा जाता है। इसने पूंजीवाद के बुराइयों को नहीं, गुणों को जरूर आत्मसात किया। नतीजतन, जापान में आय विषमता पश्चिमी विकसित देशों संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन की तुलना में बहुत कम है।

भारत में सहकारिता के लिए समर्पित मंत्रालय ‘सहकार आंदोलन’ की गति को तेज करेगा, जिसका उद्देश्य हाशिए पर रह रहे वर्गों और कम विकसित क्षेत्रों के उत्थान का है। मोदी सरकार ने जून, 2021 में कृषि संबंधी सहकारी आंदोलन को सुव्यवस्थित करते हुए ‘10,000 किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के गठन और संवर्धन’ की योजना शुरू की है। 6,865 करोड़ रुपये के कुल बजटीय परिव्यय के साथ 2027-28 तक 10,000 नए FPO बनाने और बढ़ावा देने का लक्ष्य है। अब तक सहकारी आंदोलन ने मुख्य रूप से बैंकिंग (क्रेडिट), कृषि, कृषि से संबंधित उत्पादों, आवास क्षेत्रों आदि पर ध्यान केंद्रित किया है। आने वाले दिनों में सहकारी दृष्टिकोण अन्य क्षेत्रों के लिए भी व्यवहार्य होगा।

     (लेखक ‘कमल संदेश’ के एसोसिएट एडिटर हैं)