दार्शनिक व प्रखर राष्ट्रवादी श्री अरबिंदो

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श्री अरबिंदो का मूल नाम अरबिंदो घोष है, किंतु उन्हें अरविंद भी कहा जाता है। आधुनिक काल में भारत में अनेक महान क्रांतिकारी और योगी हुए हैं, उनमें श्री अरबिंदो अद्वितीय हैं। श्री अरबिंदो घोष दार्शनिक, कवि और प्रखर राष्ट्रवादी थे, जिन्होंने आध्यात्मिक विकास के माध्यम से सार्वभौमिक मोक्ष का दर्शन प्रतिपादित किया। श्री अरबिंदो को भारतीय एवं यूरोपीय दर्शन और संस्कृति का अच्छा ज्ञान था। श्री अरबिंदो का मानना है कि इस युग में भारत विश्व में एक रचनात्मक भूमिका निभा रहा है तथा भविष्य में भी निभायेगा। उनके दर्शन में जीवन के सभी पहलुओं का समावेश है। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। संस्कृति, राष्ट्रवाद, राजनीति, समाजवाद, साहित्य और विशेषकर काव्य के क्षेत्र में उनकी कृतियां बहुचर्चित हुई हैं।

सन् 1905 में लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल के रूप में बंगाल के दो टुकड़े कर दिए, ताकि हिन्दू और मुसलमानों में फूट पड़ सके। इस बंग-भंग के कारण बंगाल में जन-जन में असंतोष फैल गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर और श्री अरबिंदो घोष ने इस जन आंदोलन का नेतृत्व किया

श्री अरबिंदो का जन्म 15 अगस्त, 1872 को बंगाल के कलकत्ता, वर्तमान कोलकाता में एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम डॉक्टर कृष्ण धन घोष और माता का नाम श्रीमती स्वर्णलता देवी था। श्री अरबिंदो की शिक्षा दार्जिलिंग में ईसाई कॉन्वेंट स्कूल में प्रारम्भ हुई और वे आगे की शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड गए। इंग्लैण्ड में श्री अरबिंदो घोष की भेंट बड़ौदा नरेश से हुई। बड़ौदा नरेश श्री अरबिंदो की योग्यता देखकर बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने श्री अरबिंदो को अपना प्राइवेट सेक्रेटरी नियुक्त कर लिया। वह बड़ौदा कॉलेज में प्रोफेसर बने और फिर बाद में वाइस प्रिंसिपल भी बने। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, जहां पर वे तीन आधुनिक यूरोपीय भाषाओं के कुशल ज्ञाता बन गए। 1892 में भारत लौटने पर उन्होंने बड़ौदा, वर्तमान वडोदरा और कोलकाता में विभिन्न प्रशासनिक व प्राध्यापकीय पदों पर कार्य किया।

श्री अरबिंदो के लिए 1902 से 1910 के वर्ष हलचल भरे थे, क्योंकि उन्होंने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने का बीड़ा उठाया था। बड़ौदा कॉलेज की नौकरी छोड़कर वह कोलकाता चले गए और कोलकाता के ‘नेशनल कॉलेज’ के प्रिंसिपल बने। इस समय तक उन्होंने ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ जीवन अपना लिया। उन पर रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के साहित्य का गहन प्रभाव था।

सन् 1905 में लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी बंगाल और पश्चिमी बंगाल के रूप में बंगाल के दो टुकड़े कर दिए, ताकि हिन्दू और मुसलमानों में फूट पड़ सके। इस बंग-भंग के कारण बंगाल में जन-जन में असंतोष फैल गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर और श्री अरबिंदो घोष ने इस जन आंदोलन का नेतृत्व किया। वे 1906 से 1909 तक सिर्फ तीन वर्ष के लिए प्रत्यक्ष राजनीति में रहे। इतने अल्प समय में भी वे लोगों के अति प्रिय बन गए। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस लिखते है— जब मैं 1913 में कलकत्ता आया, अरबिंदो तब तक किंवदंती बन चुके थे। जिस आनंद तथा उत्साह के साथ लोग उनकी चर्चा करते शायद ही किसी की वैसी करते। दो वर्ष बाद ब्रिटिश भारत को छोड़कर श्री अरबिंदो दक्षिण भारत स्थित फ्रांसीसी उपनिवेश पांडिचेरी चले गए, जहां उन्होंने अपना शेष जीवन पूर्णरूपेण अपना दर्शन विकसित करने में लगा दिया।

पांडिचेरी आने के बाद वे सांसारिक कार्यों से अलग होकर आत्मा की खोज में लग गए। वहां पर श्री अरबिंदो अंत तक योगाभ्यास करते रहे और उन्हें परमात्मा से साक्षात्कार की अनुभूति हुई। उनका दृढ़ विश्वास था कि संसार के दुःख का निवारण आत्मा के विकास से हो सकता है, जिसकी प्राप्ति केवल योग द्वारा ही संभव है। वे मानते थे कि योग से ही नई चेतना आ सकती है। श्री अरबिंदो का देहांत 5 दिसम्बर, 1950 को पांडिचेरी में हुआ।